जैसलमेर

ज्ञान के कोनों पर उदासी की धूल, रीडिंग कॉर्नर्स बदहाली के शिकार

जैसलमेर शहर में पठन-पाठन की संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाखों रुपए खर्च कर बनाए गए रीडिंग कॉर्नर आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार हो चुके हैं।

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Mar 09, 2026

जैसलमेर शहर में पठन-पाठन की संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाखों रुपए खर्च कर बनाए गए रीडिंग कॉर्नर आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार हो चुके हैं। शहर के प्रमुख हनुमान चौराहा के दोनों ओर तथा बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय के बाहर नगर विकास न्यास (यूआइटी) की ओर से कुछ वर्ष पहले इन रीडिंग कॉर्नरों का निर्माण कराया गया था। उस समय इसे शहर में पढऩे का माहौल बनाने की अच्छी पहल के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन समय बीतने के साथ यह योजना लापरवाही व अनदेखी की भेंट चढ़ गई। इन रीडिंग कॉर्नरों में लोगों के बैठकर किताबें पढऩे के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। राहगीरों और विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुए यहां बैठने के स्थान और पुस्तकों के लिए शेल्फ बनाए गए थे। खासकर स्कूल के सामने बने रीडिंग कॉर्नर से उम्मीद थी कि छात्र-छात्राएं इनका उपयोग कर सकेंगे और उनमें पढऩे की आदत विकसित होगी। मगर वर्तमान में स्थिति यह है कि इन रीडिंग कॉर्नरों पर न तो किताबें व अखबार दिखाई देते हैं और न ही पाठक। कई जगहों पर बैठने के लिए लगाई गई पत्थर की बैंचें व स्टूल क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, दीवारों पर धूल और गंदगी जमा है, आसपास कचरा भी नजर आने लगा है। रखरखाव के अभाव में लाखों रुपए की लागत से तैयार की गई यह व्यवस्था अब महज दिखावे तक सिमट कर रह गई है।

उपयोगी हो सकती थी पहल

तत्कालीन जिला कलक्टर नमित मेहता की पहल पर कुछ साल पहले अमर शहीद सागरमल गोपा राउमावि और उसके सामने जिला अस्पताल के साथ बालिका राउमावि के बाहर फुटपाथ पर यूआइटी ने रीडिंग कॉर्नर बनाए थे। अगर शुरुआत के बाद इन रीडिंग कॉर्नरों की नियमित देखरेख की जाती और यहां अखबार व किताबों की व्यवस्था सुनिश्चित की जाती, तो यह स्थान विद्यार्थियों और आमजन के लिए उपयोगी साबित हो सकते थे। लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता और समाज के जुड़ाव नहीं दिखाने के चलते यह पहल दम तोड़ती नजर आ रही है। अब भी अगर प्रशासन व यूआइटी इन रीडिंग कॉर्नरों की सुध लेकर उनका पुन: जीर्णोद्धार कर नियमित संचालन सुनिश्चित करे, तो इन्हें फिर से जीवंत बनाया जा सकता है। अन्यथा लाखों रुपए खर्च कर बनाई गई यह योजना यूं ही उपेक्षा की भेंट चढ़ती रहेगी।

शहरवासी बोले—अच्छी पहल लापरवाही की भेंट चढ़ी

रीडिंग कॉर्नर का उद्देश्य बहुत अच्छा था, लेकिन इसे बनाने के बाद किसी ने इसकी देखभाल ही नहीं की। यदि यहां अखबार और किताबें नियमित रखी जाएं तो लोग जरूर बैठकर पढ़ेंगे।

  • मुकेश पुरोहित, स्थानीय नागरिक

स्कूलों के पास बने रीडिंग कॉर्नर विद्यार्थियों के लिए काफी उपयोगी हो सकते थे लेकिन अभी इसकी हालत खराब है। प्रशासन को इसे फिर से व्यवस्थित करना चाहिए।

  • विजय दान

लाखों रुपए खर्च कर बनाए गए इन रीडिंग कॉर्नरों का आज कोई उपयोग नहीं हो रहा। जिम्मेदार विभाग को इसकी जांच कर सुधार के कदम उठाने चाहिए।

  • विश्वजीत व्यास
Published on:
09 Mar 2026 09:11 pm
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