रंग-गुलाल, चंग की थाप और फाल्गुनी उमंग के बीच जैसलमेर की होली का एक विशिष्ट और ऐतिहासिक पक्ष धुलंडी के दिन सामने आता है। विश्वप्रसिद्ध सोनार दुर्ग में इस दिन बादशाह और शहजादो का दरबार सजता है।
रंग-गुलाल, चंग की थाप और फाल्गुनी उमंग के बीच जैसलमेर की होली का एक विशिष्ट और ऐतिहासिक पक्ष धुलंडी के दिन सामने आता है। विश्वप्रसिद्ध सोनार दुर्ग में इस दिन बादशाह और शहजादो का दरबार सजता है। यह परंपरा स्वर्णनगरी की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है और हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग इसे देखने दुर्ग पहुंचते हैं। सोनार दुर्ग के व्यासा पाड़ा में पुष्करणा ब्राह्मण समाज की व्यास जाति में से प्रतिवर्ष एक विवाहित पुरुष को बादशाह बनाया जाता है, जबकि दो बालकों को शहजादे का रूप दिया जाता है। पारंपरिक वेशभूषा, तख्त और शाही अंदाज के साथ दरबार सजाया जाता है। धुलंडी के दिन जब बदशाही बरकरार, शहजादा सलामत… के जयकारे गूंजते हैं तो वातावरण में इतिहास सजीव हो उठता है। कुछ क्षणों के लिए ऐसा प्रतीत होता है मानो समय का पहिया अतीत की ओर लौट गया हो।
बादशाह-शहजादा परंपरा की शुरुआत को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलित कथा के अनुसार एक समय किसी बाहरी क्षेत्र से एक ब्राह्मण धर्म परिवर्तन के भय से भागकर जैसलमेर पहुंचा। संयोग से उस दिन होली का पर्व था। उसने यहां के लोगों को अपनी व्यथा सुनाई। स्थानीय लोगों ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए होली के स्वांग के रूप में उसे बादशाह का रूप देकर तख्त पर बैठा दिया। इसी बीच उसे खोजते हुए संबंधित क्षेत्र के शासक के लोग जैसलमेर पहुंचे। उन्होंने जब ब्राह्मण को शाही वेश में तख्त पर बैठे देखा तो यह समझ लिया कि उसका धर्म परिवर्तन हो चुका है। वे संतुष्ट होकर लौट गए, जबकि वास्तव में यह सब होली का स्वांग था। कहा जाता है कि उसी घटना के बाद से धुलंडी पर बादशाह-शहजादा का दरबार सजाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जा रही है।
उक्त परंपरा केवल होली का स्वांग भर नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता, चातुर्य और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक मानी जाती है। सोनार दुर्ग में सजने वाला यह दरबार स्थानीय निवासियों के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र रहता है। जैसलमेर की होली को अन्य स्थानों से अलग पहचान दिलाने में इस परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका है।