
जैसलमेर. कभी रेगिस्तान के बीच पानी की चमक से पर्यटकों को खींचने वाला ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब अब खुद पानी के लिए तरसता नजर आ रहा है। सावन में बारिश कमजोर रहने से ऐतिहासिक तालाब की जलराशि घटने लगी है और इसका असर उस पर्यटन अनुभव पर दिखाई देने लगा है, जो वर्षों से गड़ीसर की पहचान रहा है। सीजन में प्रतिदिन करीब 1500 पर्यटकों की आवाजाही वाले इस स्थल पर पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि पूरे पर्यटन अनुभव का अहम हिस्सा है। तालाब में जलस्तर घटने से नौकायन, फोटोग्राफी और रात में रोशनी के प्रतिबिंब जैसे आकर्षण प्रभावित हो रहे हैं। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर इन गतिविधियों से जुड़े कारोबारियों की चिंता भी बढ़ गई है। गौरतलब है कि गड़ीसर तालाब का निर्माण 1373 संवत में हुआ था। बाद में 1913 संवत में इसे काक नदी से जोड़ा गया। ऐतिहासिक रूप से यह सरोवर जैसलमेर शहर की प्यास बुझाने का प्रमुख स्रोत रहा है। इसका पानी धार्मिक कार्यों और जल पूजन में भी उपयोग होता था।
तालाब की अधिकतम गहराई करीब 20 फीट मानी जाती है। एक बार पूरी तरह भरने पर इसमें लंबे समय तक पानी रहने की क्षमता रही है। यही कारण है कि गड़ीसर केवल एक तालाब नहीं, बल्कि जैसलमेर की जल-संस्कृति और स्थापत्य विरासत का जीवंत दस्तावेज है। गड़ीसर की खूबसूरती सिर्फ इसके पानी में नहीं, बल्कि पानी और पत्थर की ऐतिहासिक वास्तुकला के मेल में छिपी है। विशाल प्रवास द्वार, टीलों की प्रोल, जालीदार पत्थर की बंगलियां और छतरियां जलराशि में प्रतिबिंबित होकर ऐसा दृश्य बनाती हैं, जो पर्यटकों के लिए खास आकर्षण है।
अब जलस्तर कम होने के साथ यह दृश्यात्मक प्रभाव भी कमजोर पड़ रहा है। खासतौर पर करीब 500 नाइट टूरिस्ट के लिए रात में रोशनी और स्मारकों के पानी में बनने वाले प्रतिबिंब गड़ीसर अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- नौकायन: जलस्तर घटने पर बोटिंग गतिविधि सीधे प्रभावित होती है।
- फोटोग्राफी: पानी कम होने से ऐतिहासिक वास्तुकला का प्रतिबिंब कमजोर पड़ता है।
- नाइट टूरिज्म: रोशनी के पानी में बनने वाले दृश्य घटते हैं।
- स्थानीय रोजगार: नाव संचालन और फोटोग्राफी से जुड़े कारोबार पर असर पड़ता है।
- बर्ड वॉचिंग: जलपक्षियों के लिए उपलब्ध जलक्षेत्र घटने से आवास प्रभावित होता है।
- वन्यजीव सुरक्षा: घटती जलराशि शिकारियों के लिए आसान पहुंच बना सकती है।
ऐतिहासिक गड़ीसर जैसे विरासत स्थल की सबसे बड़ी ताकत उसका समग्र अनुभव है। यहां पर्यटक सिर्फ स्थापत्य देखने नहीं आता, बल्कि पानी, रोशनी, प्रतिबिंब, पक्षियों और ऐतिहासिक संरचनाओं को एक साथ महसूस करता है। इसलिए जलस्तर को केवल पर्यावरणीय पैमाने से देखना पर्याप्त नहीं होगा। जल संरक्षण को पर्यटन प्रबंधन और विरासत संरक्षण से जोडऩा जरूरी है।
-सुमेरसिंह राजपुरोहित, वरिष्ठ पर्यटन विशेषज्ञ