जीतते है विदेशी, हमारे हिस्से मिलती है हार! -मरु महोत्सव के दूसरे दिन किया जाता है रोमांचक प्रतियोगिता का आयोजन
रस्साकशी का खिंचाव कसता है मेहमान-मेजबान के रिश्तों को
जैसलमेर . हार-जीत किसी भी खेल के दो पहलू हैं, जिसमें किसी पक्ष की जय होती है तो दूसरे की पराजय। बावजूद इसके एक पक्ष की लगातार जीत और दूसरे की हार के बीच देसी-विदेशी संस्कृतियों में रिश्तों की कसावट को मजबूत हो रही है और यह खेल है रस्साकशी। मरु महोत्सव के दौरान दूसरे दिन डेडानसर मैदान में आयोजित होने वाली देशी-विदेशी सैलानियों के बीच रस्साकशी प्रतियोगिता ऐसा ही खेल है। यहां विदेशी विगत कई वर्षों से लगातार जीत का परचम लहरा रहे हैं और देशी लोगों के हिस्से में पराजित होने का अफसोस आ रहा है। यह प्रतियोगिता महिला व पुरुष दो वर्गों में करवाई जाती है। दोनों ही वर्गों में विदेशी मेहमान पिछले लम्बे अर्से से जीतते आ रहे हैं।
विदेशी बनाते हैं रणनीति
-पिछले कई वर्षों से रस्साकशी प्रतियोगिता की विवेचना करें तो परिणाम के कारण भी समझ में आ जाते हैं। डेडानसर मैदान में हाथोहाथ ही प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सैलानी चुने जाते हैं।
-जैसे विदेशी अलग-अलग देशों के होते हैं, वैसे ही देशी पर्यटक भी विभिन्न शहरों से संबंधित हुआ करते हैं।
-खिलाडिय़ों के चयन और खेल के शुरू होने में पांच मिनट का समय उन्हें आपस में सम्पर्क करने के लिए मिलता है, जहां विदेशी सैलानी इन पांच मिनटों में परिचय प्राप्त कर जीत की रणनीति तैयार कर लेते हैं।
-यह प्रतियोगिता तीन चरणों में होती है, कई बार विदेशियों की टीम शुरू के दो चरणों में लगातार जीत जाते हैं और इस तरह से तीसरा चरण करवाने की नौबत ही नहीं आती।
दर्शकों का समर्थन भी नहीं आता काम
डेडानसर मैदान में दूसरे दिन हजारों की संख्या देशी सैलानी व स्थानीय लोग जमा होते हैं। वे जमकर देशी पर्यटकों की टीम का समर्थन करते हुए हुटिंग करते हैं। मगर इसका कोई असर नहीं होता और विदेशी सैलानी आसानी से महिला व पुरुष दोनों वर्गों की प्रतियोगिताएं अपने नाम कर जाते हैं। यहां तक कि, एक बार महिलाओं के मुकाबले में विदेशी महिलाएं अपनी प्रतिद्वंद्वी भारतीय महिलाओं से कहीं अधिक उम्रदराज थीं, लेकिन फिर भी जीत उन्होंने ही दर्ज की। हार-जीत के पहलू के इतर यह प्रतियोगिता मरु महोत्सव के चंद सबसे लोकप्रिय इवेंट में शामिल है।