-आर्थिक तंगी जूझ रहे कार्मिक
-जिले में एसआरजी चिकित्सालय सहित कई विभागों में लगे हुए है हजारों कर्मचारी
जिले सहित प्रदेश भर में संविदा कर्मचारियों को नियमित करने के दावे भले ही हर सरकार की ओर से किए जाते रहे हो। लेकिन, संविदा कर्मचारियों को पिछले 15 साल में पूरी राहत नहीं मिल सकी है।
पिछली सरकार की ओर से चुनावी साल में संविदा कर्मचारियों को नियमित करने के लिए नया कानून भी बनाया गया। इसके बाद भी प्रदेश के 1.10 लाख से अधिक संविदाकार्मियों की नौकरी पक्की नहीं हो सकीं। संविदा कर्मचारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई के बीच वेतन सहित अन्य सुविधाएं नहीं होने से घर चलाना भी मुश्किल हो रहा है। दरअसल, पिछली सरकार ने पहले तो संविदा कर्मचारियों को सीधे ही स्थायी करने का वादा किया था।
इसके बाद सेवा नियमों में पूरी तरह मामले को उलझा दिया। अब संविदा कर्मचारियों को नई सरकार से राहत की आस है, कर्मचारियों का कहना है कि जुलाई माह में आने वाले बजट में सरकार इस मामले को स्पष्ट कर उन्हे राहत दें। क्योंकि महंगाई के दौर में सरकार ने संविदा कर्मचारियों के मानदेय के स्लैब में ज्यादा बड़ा बदलाव नहीं किया है। इस वजह से प्रदेश के संविदा कर्मचारी खुश नहीं हैं। संविदा कर्मचारियों का कहना है कि उन्हीं पदों पर काम करने वाले स्थायी कर्मचारियों के मुकाबले मानदेय काफी कम है। सरकार की ओर से संविदा कर्मचारियों की संख्या 1.10 लाख बताई गई है। जबकि कर्मचारी संगठनों के हिसाब से संविदा व मानदेय कर्मचारियों की संख्या चार लाख से अधिक है।
कर्मचारी संगठनों के हिसाब इतने कर्मचारी है प्रदेश में
- जनता जल योजना में 6500
- एनआरएचएम मैनेजमेंट में 2800
- फार्मासिस्ट संविदा कर्मचारी 3000
- एनयूएचएम के 2200
- एमएनडीवाई के 4400
- आंगनबाड़ी में करीब 1.50 लाख
- मदरसा व पैराटीचर वंचित 4500
- लोक जुंबिश में 2200
- विद्यार्थी मित्र पंचायत सहायक 27000
- नरेगा कर्मी 19000 - प्रेरक 12000
- समाज कल्याण विभाग के रसोइ एवं चौकीदार 910
- होमगार्ड 28000
-आईटीआई संविदा कर्मी 2500
- कृषि मित्र 17000
- व्यावसायिक शिक्षक 1000
- शिक्षाकर्मी लगभग 4500
- कंप्यूटर शिक्षक 5000
-कुक कम हैल्पर 1 लाख
- प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों में लगभग 20 हजार संविदा कर्मी लगे हैं।
आवेदन मांगे, लेकिन आगे नहीं बढ़ी बात-
पिछले साल सरकार ने संविदाकर्मियों को नियमित करने के लिए अलग से भर्ती कराने की बात कही थी। लेकिन, एक साल में किसी भी विभाग में अलग से कोई भर्ती नहीं की गई। पिछले साल दावा किया गया कि जो नई भर्ती होगी उनमें भी संविदाकर्मियों के लिए अलग से पद तय किए जाएंगे। पिछले एक साल में 10 भर्तियों के लिए आवेदन मांगे गए। लेकिन, एक में भी इस नियम की पालना नहीं हुई।
स्थायी नौकरी, नए नियमों में उलझे सरकार ने प्रदेश के 1.10 लाख संविदा कर्मचारियों को स्थायी करने की दिशा में भले ही एक कदम आगे बढ़ाया हो। लेकिन, अभी स्थायी की राह पूरी तरह नहीं खुली है। संविदा कर्मचारियों का कहना है कि सरकार को स्थायीकरण के आदेश जारी करने चाहिए थे। लेकिन, हर बार नए नियमों में उलझा दिया जाता है।
दो आदेश में अलग-अलग दावे-
सरकार की ओर से इस साल जारी आदेश में स्थायी करने के दावे किए गए। जबकि पिछले साल जारी आदेश में पहले पांच साल और फिर तीन साल का कार्यकाल बढ़ाने की बात कही गई थी। ऐसे में सरकार के दोनों आदेश से संविदा कर्मचारियों को नियमित करने की राह में कई चुनौती है।
2019 में कमेटी का गठन-
कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद एक जनवरी 2019 को संविदा कर्मचारियों की समस्या के समाधान के लिए मंत्री मंडलीय उप समिति का गठन किया था। इसमें तत्कालीन ऊर्जा मंत्री बीडी कल्ला को अध्यक्ष व कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव को सदस्य सचिव बनाया गया था। चार मंत्रियों को सदस्य बनाया गया था। कमेटी ने पिछले साल रिपोर्ट दी थी। इसमें संविदा कर्मचारियों को स्थायी करने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई ठोस काम नहीं होने से मामला अधर-झूल में ही है।
फाइलों में उलझा रहा मामला-
भाजपा सरकार ने दो जनवरी 2014 को संविदाकर्मियों की समस्याओं के निराकरण के लिए चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। इसमें तत्कालीन मंत्री राजेंद्र राठौड़ को अध्यक्ष बनाया गया था। तत्कालीन मंत्री यूनुस खान, अजय सिंह को सदस्य बनाया गया था। कमेटी में सदस्य सचिव कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव को बनाया गया था। इस कमेटी ने भी स्थायी करने की सिफारिश की थी, जो पांच साल फाइलों में अटकी रही।
ये बोले कर्मचारी-
पिछली सरकार ने समिति बनाकर स्थायी करने का वादा किया था। समिति भी बनी लेकिन कुछ नहीं हुआ। 6000 में घर चलाना मुश्किल है। ठेकाप्रथा बंदकर सरकार कार्मिकों को स्थायी करें ताकि कर्मचारियों को राहत मिले।
कैलाश मेहरा, अध्यक्ष प्लेसमेंट कर्मचारी संघ।
अब तो आचार संहिता हठ गई-
सरकार ने अनुभव के आधार पर नियमित करने का वादा किया था, लेकिन कार्मिक विभाग ने इस दिशा में कोई काम नहीं किया। इससे अभी संविदा कर्मचारियों का कुछ नहीं हो पाया है।अब तो आचार संहिता भी हट गई है। सरकार को जल्द इस दिशा में काम करना चाहिए। देवेन्द्र नागर, जिलाध्यक्ष राज.पंचायत शिक्षक विद्यालय सहायक संघ।
ठेका प्रथा बंद हो-
कांग्रेस सरकार ने ठेकाप्रथा बंद की थी। अच्छी बात है, लेकिन अभी इसमें कुछ भी नहीं हुआ है। मैं दस साल से अस्पताल में ठेके पर काम कर रहा हूं। 8 हजार रुपए में घर चलाना मुश्किल है। सरकार द्वारा बनाया गया आरएलएसडीसी बोर्ड का जल्द लागू करना चाहिए। पवन कुमार शर्मा, कम्प्यूटरऑपरेटर एसआरजीअस्पताल।
समान काम-समान वेतन मिले-
हम 12 साल से अस्पताल में काम कर रहे हैं। लेकिन इतना वेतन मिलता है कि उसमें घरखर्च चलाना मुश्किल है। सरकार से हमारी तो एक ही मांग है कि समान काम- समान वेतन के हिसाब से वेतन दें।
नीता कुमार पवन, कम्प्यूटर ऑपरेटर एसआरजी अस्पताल।