मरीजों के सफेद दाग हटाने के लिए 20 साल से जुटे हैं डॉ. कच्छवाह, अब तक 1 हजार से अधिक रोगियों को दिलाया सफेद दाग से छुटकारा
जोधपुर. डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज के स्कीन एवं वीडी के हैड ऑफ द डिपार्टमेंट डॉ. दिलीप कच्छवाह की सफेद दाग (बिटिलिगो) नामक बीमारी का उपचार के लिए सर्जरी तकनीक पबमेट में पब्लिश हुई है। इसके बाद जोधपुर नाम की इस तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। जबकि ये तकनीक हमारे जोधपुर के मथुरादास माथुर अस्पताल में इजाद की गई थी। उनकी इस तकनीक का इंटरनेशनल चिकित्सा जगत में लोहा माना जा रहा है। पूरे विश्व में 1 से 2 प्रतिशत आबादी सफेद दाग से ग्रसित है। इस सफलता के लिए डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. एसएस राठौड़ ने उन्हें व पूरी फैकल्टी को बधाई दीं।
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यूं हुआ तकनीक का आविष्कार
डॉ. कच्छवाह 20 साल पहले मुहांसों के गड्डों का इलाज कर रहे थे। तब छोटे-छोटे कण उनकी आंखों के पास आ रहे थे। इन्हीं सोच ने उन्हें बेफालतू के कणों को सफेद दाग के कार्यों में लेना शुरू कर दिया। इसके बाद एक युवती के सफेद दाग मिटाने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, लेकिन मरीज के कुछ दाग वाले हिस्सों में सर्जरी के बाद रस्सी पडऩे लगी, लेकिन सफेद दाग मिट गए। इसे हताश न होकर डॉ. कच्छवाह ने अपना रिसर्च जारी रखी। आखिरकार डॉ. कच्छवाह ने जांघ के साइट से प्राकृतिक नॉन ट्रिप्सिनाइज्ड (अधिचर्म कोशिकाओं) को सफेद दाग वाले स्थान पर प्रत्यारोपित कर रोगियों को सफेद दाग से 82 से 90 प्रतिशत तक मुक्ति दिला दी। ये टेक्निक इंटरनेशनल पिगमेंट सेल कांफ्रेंस में वाशिंगटन में प्रदर्शित की गई। इस टेक्निक को आविष्कार की श्रेणी में रखा गया। जो 40 वर्षों के भीतर सब टेक्निक को प्रतिस्थापित कर देगी। ये टेक्निक विश्वक कांग्रेस ऑफ डर्मेटोलॉजी, इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ डर्मेटोलॉजी, डेसिल व अन्य विश्व स्तरीय कांफ्रेंस व भारत में प्रदर्शित हो चुकी है। जिसकी पूरे विश्व भर के स्कीन स्पेशलिस्ट ने सराहना की।
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जान लीजिए कैसे होती है
ये एक माइनर सर्जरी है। जिसमें पेशेंट को लोकल एनेस्थेसिया दिया जाता है। सभी केस में डोनर यानी पेशेंट के जांघ के हिस्सों को चयनित कर उसकी चमडी से कोशिकाओं का एक तिहाई हिस्सा लिया जाता है। इसमें ब्लैड के जरिए अधिचर्म कोशिकाओं की परत को हटाया जाता है। एंटीबायोटिक मलने के बाद अधिचर्म कोशिकाओं का जल बनने पर अपघर्षण से हटाया जाता है। इसको पेस्ट के रूप में इकट्टा कर जालीदार अधिचर्म कणों को प्राप्तिकरण स्थान पर अपनी टेक्निक से डॉ. कच्छवाह प्रत्यारोपित कर देते है। इस प्रक्रिया में किसी तरह के जटिल उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती। इस टेक्निक का उपयोग नॉन हिलिंग अल्सर समेत कई उपचारों में किया जा रहा है।