
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सेंट्रल जेल जोधपुर में न्यायिक हिरासत के दौरान विचाराधीन बंदी रूपाराम की मौत के मामले में राज्य सरकार को उसके परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मौत को प्रथमदृष्टया न तो प्राकृतिक माना और न आत्महत्या। साथ ही पुलिस महानिदेशक को 48 घंटे में एफआइआर दर्ज करने और जांच राजस्थान पुलिस सेवा के अधिकारी से कम रैंक के अधिकारी को नहीं सौंपने के निर्देश दिए हैं।
न्यायाधीश फरजंद अली की एकल पीठ ने कहा कि रूपाराम की मौत जेल प्रशासन और राज्य के नियंत्रण में हुई, इसलिए प्रशासन अपनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। हत्या हुई या नहीं और किसी की आपराधिक जिम्मेदारी बनती है या नहीं, इसका फैसला निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच के बाद होगा।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक जांच उपयोगी सामग्री उपलब्ध करा सकती है, लेकिन आपराधिक जांच का स्थान नहीं ले सकती। खासकर तब, जब घटना से जुड़ी अधिकांश सामग्री उन्हीं राज्य अधिकारियों से संबंधित हो, जिनके आचरण की जांच होनी है। ऐसे में निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच जरूरी है। पीठ ने सभी निर्देशों की अनुपालना रिपोर्ट 60 दिन में पेश करने को कहा है।
रूपाराम की 2 जुलाई 2025 को मौत हुई थी। पोस्टमार्टम में शरीर पर छह चोटें मिलीं। इनमें सिर पर पांच और हाथ पर एक चोट थी। दो चोटें धारदार और अन्य कुंद वस्तु से लगी थीं। कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कहा कि हालत गंभीर होने के बावजूद करीब आधे घंटे तक कोई नर्स, कंपाउंडर, चिकित्सक या जेल अधिकारी उसके पास नहीं पहुंचा। साथी कैदी ही उसे बचाने का प्रयास करते रहे। कोर्ट ने कहा कि समय पर पर्याप्त चिकित्सा मिलने पर उसकी जान बचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने जेलों में 24 घंटे चिकित्सा सुविधा, पर्याप्त सीसीटीवी, शौचालय और पेयजल उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। डिस्पेंसरी में जीवनरक्षक दवाएं, जरूरी उपकरण और ईसीजी जैसी सुविधाएं रखने तथा समर्पित चिकित्सा कर्मियों की तैनाती पर निर्णय लेने को कहा है। मामले की अनुपालना रिपोर्ट 60 दिन में पेश करनी होगी। मामला 30 अक्टूबर 2026 को फिर सूचीबद्ध किया गया है।