- जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय का कुलगीत बनकर तैयार, स्वयं कुलपति ने रची रचना
मोठ, बाजरा का खीचड़ा, कैर, कुमठियां सांगरी पंचकूटा। सर पर ताज पचरंगी साफा, मूछों में छुपी मुस्कान।।किसी भी प्रदेश के गीत व संगीत से ही वहां की सांस्कृतिक धरोहर की पहचान होती है। कुछ एेसा ही आभास जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय के कुलगीत से ली गई इन पंक्तियों में होता है। इनमें मारवाड़ की मिठास का एहसास है। जोधपुर कृषि विवि का कुलगीत बनने के बाद इस पर बोर्ड की मोहर लगने के बाद यह विवि का कुलगीत बन गया है।जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय का कुलगीत बनकर तैयार, स्वयं कुलपति ने रची रचना...
६ महीने लगे
कुलगीत को तैयार करने के लिए विश्वविद्यालय को छह महीने लगे। सबसे बड़ी बात यह है कि अमूमन विश्वविद्यालय की ओर से किसी कवि या लेखक से कुलगीत तैयार करवाया जाता है, लेकिन यहां एेसा नहीं हुआ। कुलपति डॉ. बलराज सिंह ने खुद कुलगीत तैयार किया है। इसमें छात्र मालाराम ने उनका सहयोग किया। सब कुछ मिलेगा सुनने को
कुलगीत पर पश्चिमी राजस्थान का खान पान, रहन-सहन और यहां की विषमता का भी उल्लेख है। अब जीरा जीव का बैरी नहीं रहा... ये भी गीत में बताया गया है।
विद्यार्थी होंगे रू-ब-रू
आधुनिकता की वजह से जहां आज के विद्यार्थी अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, वहीं यह गीत इन विद्याथर््िायों को मारवाड़ की इस संस्कृति से जोडऩे में एक अहम भूमिका निभा रहा है। इस गीत की वजह से विश्वविद्यालय के छात्र पश्चिमी राजस्थान की संस्कृति से रू-ब-रू होंगे।
इनका कहना है
हम एेसा कुलगीत तैयार करना चाहते थे, जिसे सुनते ही पता चल जाए कि मारवाड़ के लोगों का रहन-सहन, पहनावा और सांस्कृतिक विरासत क्या है। वह किन-किन विषमताओं का सामना करते हुए संघर्षशील रहकर खेती करके अन्नदाता कहलाते हैं। हमारी मेहनत सफल हुई और कुलगीत में पश्चिमी राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर सुनने को मिलेगी।
डॉ. बलराज सिंह, कुलपति, जोधपुर कृषि विश्वविद्यालय