जोधपुर

Jodhpur Human Story: 10 साल से जंजीरों में कैद है लक्ष्मण राम: बेड़ियां खुलते ही फेंकता है पत्थर; इलाज को तरस रहा

ह्यूमन एंगल न्यूज: राजस्थान के जोधपुर जिले में लक्ष्मण राम मेघवाल पिछले 10 से 12 वर्षों से जंजीरों से बंधा हुआ है। परिवार के लोगों का कहना है कि जंजीरों से मुक्त होते ही लक्ष्मण अनियंत्रित होकर आसपास के घरों और राहगीरों पर पत्थर फेंकने लगता है।
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May 14, 2026
Lakshman Ram Meghwal tied with iron chains at his home
पेड़ के साथ लोहे की चेन से बंधा हुआ लक्ष्मण मेघवाल. Photo- Patrika

ह्यूमन एंगल न्यूज: जोधपुर/हरियाढाणा। राजस्थान के जोधपुर जिले में हरियाढाणा से पटेल नगर जाने वाले रास्ते पर एक साधारण से घर की चारदीवारी के भीतर 36 वर्षीय लक्ष्मण राम मेघवाल की जिंदगी पिछले 10 से 12 साल से लोहे की जंजीरों में कैद है। मानसिक रूप से अस्वस्थ लक्ष्मण कभी गांव की गलियों में आम लोगों की तरह घूमता-फिरता था, लेकिन हालात ऐसे बने कि अब उसका संसार एक छोटे से कमरे और बेड़ियों तक सिमटकर रह गया है।

परिवार मजबूरी में उसे बांधकर रखने को अपनी सुरक्षा और उसकी देखभाल का एकमात्र तरीका बताता है। दिन-रात जंजीरों में बंधे लक्ष्मण की सूनी आंखें और बिखरी जिंदगी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और ग्रामीण परिवारों की बेबसी की दर्दनाक तस्वीर पेश करती हैं। परिवार के सदस्य छोटे भाई चंद्रु और वृद्ध माता गुड्डी देवी का कहना है कि जंजीरों से मुक्त होते ही लक्ष्मण अनियंत्रित होकर आसपास के घरों और राहगीरों पर पत्थर फेंकने लगता है।

वृद्ध मां व छोटे भाई के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी

किसी अनहोनी की आशंका के चलते मजबूरी में उसे बांधकर रखना पड़ रहा है। 74 वर्षीय विधवा गुड्डी देवी मजदूरी और वृद्धावस्था पेंशन के सहारे परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं। वहीं छोटा भाई भी मजदूरी कर परिवार चला रहा है। जर्जर और टूटे-फूटे मकान में गुजर-बसर कर रहे इस परिवार के पास लक्ष्मण के समुचित इलाज के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं।

डब्लयूएचओ मानकों के विपरीत हालात

विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुसार मानसिक रोगियों को सम्मानजनक जीवन, उचित उपचार, रहने की समुचित व्यवस्था और पुनर्वास मिलना उनका मूल अधिकार है। लंबे समय तक किसी मानसिक रोगी को जंजीरों में बांधकर रखना मानवाधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के सिद्धांतों के खिलाफ माना जाता है।

कई बार लगाई मदद की गुहार

परिजनों के अनुसार उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को स्थिति से अवगत कराया। परिवार का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग की टीम एक बार मौके पर पहुंची थी, लेकिन सीमित कार्रवाई के बाद मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया।

सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल

यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर स्थिति और सरकारी दावों की वास्तविकता को भी उजागर करता है। सवाल यह है कि आधुनिक दौर में भी एक मानसिक रोगी को उपचार और पुनर्वास के बजाय 43 डिग्री तापमान में जंजीरों में जीवन बिताने को क्यों मजबूर होना पड़ रहा है।

इनका कहना है

मैंने कई बार स्वास्थ्य विभाग को अवगत कराया, लेकिन अभी तक कोई स्थायी सहायता नहीं मिली। मजदूरी करके जैसे-तैसे घर चला रही हूं।

  • गुड्डी देवी, हरियाढाणा
Updated on:
14 May 2026 01:14 pm
Published on:
14 May 2026 12:28 pm