जोधपुर

मेहरानगढ़ प्राचीर से ‘राजरणछोड़’ की आरती के दर्शन करती थी रानी राजकंवर, प्रसिद्ध है जोधपुर का यह कृष्ण मंदिर

भगवान कृष्ण का एक नाम रणछोड़ भी है। राजरणछोडज़ी का मंदिर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह की द्वितीय रानी जाड़ेची राजकंवर ने सन् 1905 में एक लाख रुपए खर्च कर बनवाया था।
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krishna janmashtami in jodhpur
मेहरानगढ़ प्राचीर से ‘राजरणछोड़’ की आरती के दर्शन करती थी रानी राजकंवर, प्रसिद्ध है जोधपुर का यह कृष्ण मंदिर

जोधपुर. भगवान कृष्ण का एक नाम रणछोड़ भी है। राजरणछोडज़ी का मंदिर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह की द्वितीय रानी जाड़ेची राजकंवर ने सन् 1905 में एक लाख रुपए खर्च कर बनवाया था। उस समय जोधपुर रेलवे स्टेशन के ठीक सामने की जमीन को खास तौर से तीस फीट ऊंचा किया गया ताकि रानी राजकंवर मेहरानगढ़ की प्राचीर से दर्शन कर सके। मंदिर निर्माण के बाद रानी किले की प्राचीर से ही संध्या आरती के दर्शन करती थी। मंदिर पुजारी आरती की ज्योति को नियमित मंदिर छत पर ले जाता था। रानी राजकंवर जीवन में कभी दर्शनार्थ मंदिर नहीं पहुंची। राजकंवर के पुत्र महाराजा सरदारसिंह की मौजूदगी में मंदिर को भक्तों के दर्शनार्थ खोला गया था।

आराध्य देव रणछोड़ के आगे रानी राजकंवर ने अपना नाम जोडकऱ मंदिर का नाम राज-रणछोड़ मंदिर रखा। वर्तमान में देवस्थान विभाग प्रबंधित मंदिर में जन्माष्टमी पर विशेष मनोरथ और आकर्षक रोशनी की जाती है। राजरणछोड़ मंदिर के कलात्मक मुख्य प्रवेश द्वार से करीब तीस सीढिय़ां पूरी होने के बाद एक कलात्मक तोरणद्वार है। मंदिर के गर्भगृह में काले मकाराना पत्थर की भगवान रणछोड़ की प्रतिमा स्थापित है।

इतिहाविदों के अनुसार राजकंवर का विवाह नौ वर्ष की आयु में जोधपुर के तत्कालीन राजकुमार जसवंतसिंह के साथ हुआ था। वर्ष 1854 में हुए ‘खाण्डा’ विवाह के दौरान राजकुमार जसवंत सिंह की सिर्फ तलवार को ही जामनगर भेजा गया और तलवार के साथ राजकुमारी ने सात फेरे लिए थे। जोधपुर के मेहरानगढ़ में प्रवेश करने के बाद रानी राजकंवर जीवनभर दुर्ग से बाहर नहीं निकली। रानी ने मंदिर के पास ही जसवंत सराय का निर्माण भी करवाया था।

Published on:
19 Aug 2019 02:27 pm