राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में नवजात शिशुओं की मौत के मामले में सरकार को आड़े हाथों लिया है। अदालत ने इस सिलसिले में बिंदुवार रिपोर्ट मांगी है।
राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नन्द्राजोग व न्यायाधीश रामचंद्रसिंह झाला की खंडपीठ ने प्रदेश में नवजात बच्चों की मौत को लेकर सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों पर राजस्थान हाईकोर्ट ने असंतोष जताते हुए मौखिक फटकार लगाई है। वहीं मामले के न्यायमित्रों अधिवक्ता राजवेंद्र सारस्वत व अधिवक्ता कुलदीप वैष्णव से मामले में सहयोग करते हुए नवजातों की मौत के सम्बन्ध में बिंदुवार रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
प्रदेश में १५ महीनों में ३२ हजार नवजात बच्चों की मौत
सीजे की खंडपीठ में राजस्थान पत्रिका में २ सितंम्बर २०१७ को प्रकाशित समाचार पिछले दो महीनों के दौरान बांसवाड़ा में हुई ९० नवजातों की मौत पर स्व प्रेरणा से प्रसंज्ञान लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई पर सरकार की ओर से प्रदेश में १५ महीनों में ३२ हजार नवजात बच्चों की मौत का आंकड़ा पेश किया गया था। सीजे नंद्राजोग ने सरकार की ओर से पेश हुए एएजी कांतिलाल ठाकुर के सहयोगी रिषभ तायल से पूछा कि इनकी मौत कैसे हुई ? यह तो रिपोर्ट में लिखा ही नहीं है। उन्होंने पूछा कि कितनी मौतें प्रीमेच्योर डिलीवरी में हुई? कितनों की मौत नवजात की माताओं के कुपोषण से हुई ? कितने नवजात कम वजन के पैदा हुए ? मरने वाले नवजातों में लड़कियां कितनी थीं व लड़के कितने थे? इस तरह कुल सात बिन्दुओं पर छह सप्ताह में पूरी रिपोर्ट पेश करनी होगी।
न्यायमित्रों से सहयोग मांगा
सीजे नंद्राजोग ने सुनवाई के दौरान खंडपीठ में मौजूद न्यायमित्रों राजवेंद्र सारस्वत और कुलदीप वैष्णव को भी यह पता करने के निर्देश दिए हैं कि राजस्थान के आसपास के राज्यों से तुलनात्मक रूप से राजस्थान की क्या स्थिति है? सरकार के आंकड़ों से हाईकोर्ट खुश नहीं है, क्योंकि हाईकोर्ट का मानना है कि करीब २३ लाख महिलाओं को मॉनिटर ही नहीं किया गया, जिसकी वजह से कई नवजातों की मौत हो गई। सरकार गर्भवती महिलाओं को कितनी देखभाल कर रही है? कुपोषण को लेकर क्या कर रही है? सरकार इस विषय पर अब छह सप्ताह में रिपोर्ट दे। इसके बाद ही अदालत आदेश जारी करेगी।