तकनीक के साथ सूचना तंत्र से पकड़ में आया
राज्य की पुलिस भी बदमाशों की धरपकड़ व वारदातों पर अंकुश लगाने के लिए संचार क्रांति व तकनीकी युग में मोबाइल पर निर्भर है। इसी वजह से मुखबिर व सूचना तंत्र वाली पुरानी पुलिसिंग से वर्तमान पुलिस कोसों दूर हो गई है। रंगदारी के लिए गोलियां चला कर दहशत फैलाने वाले लॉरेंस के गुर्गों ने आधुनिकता के दौर में पुलिस के इस हथियार का तोड़ निकाल लिया और विदेशी नम्बर से व्हॉट्सअप कॉलिंग से गिरोह चलाने लगे। वे थोड़े-थोड़े दिन के अंतराल में विदेशी नम्बर ही नहीं, मोबाइल भी बदल रहे थे। पुलिस को इन्हें पकडऩा बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया था।
यही वजह है कि साढ़े सात माह तक पुलिस शूटर को पकड़ पाना तो दूर, उनके पास तक नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में पुलिस ने एक बार फिर पुरानी पद्धति यानी मुखबिर व सूचना तंत्र विकसित करने पर जोर दिया। उसी के बूते पर पुलिस हरेंद्र तक पहुंच पाई।
क्लीन शेव वाली पुलिस ने बढ़ाई दाढ़ी व मूंछें
लॉरेंस के शूटर तक पहुंचने के लिए पुलिस ने खुद के विभाग से ऐसे सिपाहियों को ढूंढ-ढूंढ कर सूचनाएं संकलित करने में लगाया। हमेशा क्लीन शेव रहने वाले पुलिस के कई सिपाहियों ने अपराधियों के गिरोह में घुस पैठ करने और अपराधी जैसा दिखने के लिए दाढ़ी मूंछें तक बढ़वा लीं, ताकि वे अपराधियों से घुल मिल कर सूचनाएं ला सकें।
सिर्फ एक पुख्ता सूचना की दरकार थी और वो मिल गई
पुलिस कमिश्नर अशोक राठौड़ का कहना है कि हरेंद्र जाट, काली राजपूत व भोमाराम पुलिस से बचने के लिए व्हॉट्सअप कॉलिंग की मदद ले रहे थे। इसका तोड़ निकालने के लिए मुखबिर तंत्र विकसित किया गया। इसके लिए विभाग के पुराने सिपाहियों को तैयार किया गया। सिर्फ एक पुख्ता सूचना का इंतजार था और उसी से सफलता मिल गई।
कई दिन से था गुजरात की राजधानी में
देश व दुनिया में सात महीने से किरकिरी करवा रही जोधपुर पुलिस के लिए हरेन्द्र चुनौती बना रहा। सात माह से अधिक समय तक पुलिस उसके पास तक नहीं पहुंच पाई और वह बार-बार गोलियां चलाकर दहशत फैलाता रहा। वह कई दिनों से गुजरात की राजधानी गांधीनगर व आस-पास के क्षेत्रों में छिपा हुआ था। इधर, जोधपुर पुलिस पंजाब-हरियाणा के साथ राजस्थान के कई जिलों खाक छानती रही। पुलिस को अंदेशा है कि वह गांधीनगर की आनंद विहार सोसायटी में किसी फ्लैट में रह रहा था। हालांकि उसे व उसके साथी अनमोल को सोसायटी के बाहर दबोचा गया।