
कानपुर । चुनावी मौसम में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर सभी राजनीतिक दलों के दिल अजीज बन गए। क्योंकि प्रदेश की 21 लोकसभा सीटों में 21 फीसदी दलित मतदाता जीत-हार तय करते हैं। इसी के कारण सभी राजनीतिक दल अपने को दलितों को हितैषी बताकर आंबेडकर जयंकी के जरिए उनके करीब पहुंचने की कोशिश की। सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा ने अलग-अलग तरीके से बाबा साहब की जयंती धूम-धाम के साथ मनाई। नेताओं ने बाबा साहब की तस्वीर के साथ अपनी फोटो लगा पूरे शहर को बैनर-होडिंग्स से पाट दिया। भाजपा ने अपनी योजना के तहत हर बूथ पर पहुंच सामाजिक समरसता का संदेश दिया और कई नेताओं ने दलित बस्तियों में जाकर भोजन किया। वहीं बसपा पदाधिकाररी, कार्यकर्ताओं की फौज आंबेडकर मुर्तियों के पास सैकड़ों की संख्या में एकत्र हुए और फूल-माल्यापर्ण कर जिंदाबाद के नारे लगाए। धुर विरोधी समाजवादी पार्टी के नेता भी आंबेडकर जयंती पर सड़क पर उतरे और उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने बाबा साहब को याद कर उनके कार्यो का गुणगान किया।
नाम बदलते ही बदल गया नजरिया
उत्तर प्रदेश की सरकार ने डॉक्टर आंबेडकर का नाम बदल कर डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर कर दिया तो अन्य दलों ने भी पीछे रहने के बजाए फ्रंट पर आकर जयंती अपने-अपने तरीके से मनाई। इस बार सभी राजनीतिक दलों में बाबा साहेब की जयंती (14 अप्रैल) मनाने की होड़ से लगी थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस बार आंबेडकर जयंती सबसे बड़े पैमाने पर मनाई जा रही है। इसका बड़ा कारण यूपी में बदला राजनीतिक परिदृश्य है। समाजवादी पार्टी (एसपी) और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के साथ आने को ओबीसी और दलित गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी भी इसे जोर-शोर से मनाया। इसके अलावा हाल ही में एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर हुए आंदोलन ने भी दलित राजनीति को केंद्र में ला दिया है। बीजेपी और आरएसएस पिछले कुछ वर्षों से दलितों पर काम कर रहे हैं। प्रदेश और देश में हाल ही में हुए घटनाक्रमों ने बीजेपी की दलित राजनीति को चोट पहुंचाई है। ऐसे में भाजपा आंबेडकर जयंती को धूमधाम से मनाकर दलितों के में अच्छा संदेश दिया।
दलित बस्तियों में गुजारी रात
कभी दलितों की चैम्पियन रही कांग्रेस भी खुद को फिर से दलित हितैषी पार्टी साबित के लिए जोर लगा रही है। इसी के तहत बाबा साहब की जयंती के अवसर पर कांग्रेस ने भी आंबेडकर जयंती बड़े धूम-धाम के साथ मनाई। कांग्रेस के सभी छोटे बड़े नेता घरों से निकल कर दलित बस्तियों में गए और अपने को उनका सबसे ज्यादा करीबी बताया। जहां तक बसपा की बात है तो वह हर साल ही बाबा साहब की जयंती धूमधाम से मनाती है। यूपी के राज्यपाल राम नाईक ने भी आंबेडकर का नाम बदलने को लेकर जो मुहिम चलाई, उसका असर भी सरकार पर देखा जा रहा है। लोकसभा चुनाव अगले साल हैं। अब चुनावी साल और माहौल में बाबा साहेब को अपना राजनीतिक ब्रैंड बनाकर वोटरों के बीच ले जाने की होड़ सभी दलों में है। और इसकी शुरुआत आंबेडकर जयंती से हो गई।
सैकड़ों की संख्या में लगाई गई होर्डिग्स
पिछले साल की तुलना में इस वर्ष पूरे शहर में सैकड़ों की संख्या में नेताओं ने बाबा साहब की तस्वीर के साथ अपनी-अपनी फोटो लगाकर होर्डिंग्स लगवाईं। चारो राजनीतिक दलों के नेताओं की होर्डिंग्स अगल-बगल लगाई गई। भाजपा के बगल में बसपा तो कांग्रस औा सपा के नेताओं के साथ डॉक्टर साहब के बैनर लगाए गए। दलित चिंतक धनराम बौद्ध कहते हैं कि डॉक्टर आंबेडकर समाज सुधारक थे। उनकी प्रासंगिकता बढ़ रही है। पहले वह दलितों में ज्यादा लोकप्रिय थे, लेकिन मंडल के बाद पिछड़ों में स्वीकार्यता बढ़ी है। आंबेडकर के दर्शन के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। जैसे-जैसे दलित-पिछड़े शिक्षित हो रहे हैं, बाबा साहेब के विचारों का प्रसार भी बढ़ रहा है।
भाजपा-सपा ने झोंकी ताकत
भाजयुमो ने आंबेडकर जयंती पर शोभायात्रा निकाली। चुन्नीगंज चौराहे से महानगर संयोजक अमन शुक्ला के नेतृत्व में शुरू हुई शोभायात्रा में कई वाहनों का काफिला था। यात्रा का कई स्थानों पर स्वागत हुआ। बाबूपुरवा में यात्रा का समापन सभा के रूप में हुआ। सपा महानगर इकाई ने नवीन मार्केट स्थित पार्टी कार्यालय में डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई। इस दौरान आयोजित गोष्ठी में महानगर अध्यक्ष अब्दुल मुईन खां ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देश के सर्वहारा समाज के हित को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान बनाया था। आज कुछ सांप्रदायिक ताकतें उसमें छेड़छाड़ करना चाहती हैं। वह दलितों पर अत्याचार कर रही हैं।