धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण, दशकों से चल रहा शोध
कानपुर। बिल्हौर के मकनपुर में हजरत बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार नायाब चीजों के लिए मशहूर है। यहां लोग लंबे समय से शोध भी कर रहे हैं। यहां रखा एक नायाब प्याला जहर भी पहचान लेता है। बादशाह अकबर ने यहां पर एक चादर भी चढ़ाई थी।
चल रहा ६०२वां उर्स
मकनपुर शरीफ में इस समय ६०२वां उर्स चल रहा है। यहां अकीदतमंदों की भारी भीड़ उमड़ रही है। हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए मशहूर मकनपुर शरीफ का उर्स लोगों की आस्था का केंद्र है। यहां पहुंचने वालों में यहां की नायाब चीजों के प्रति बेहद लगाव है। देश के विभिन्न हिस्सों से यहां पहुंचने वाले लोग यहां वक्त गुजारते हैं और जियारत करते हैं।
तीन दशक से चल रहा शोध
यहां की नायाब चीजें लोगों के लिए शोध का विषय भी है। प्रोफेसर मजहर अब्बास नकवी यहां की चीजों पर रिसर्च करके उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाने की कोशिश करते हैं। तमाम शोधपत्रों में यहां की चीजों का भी जिक्र किया गया है।
जहर पहचान लेता प्याला
मकनपुर शरीफ में जियारत करने वाले लोग यहां रखे मदार साहब के वक्त का एक प्याले प्रति अकीदत रखते हैं। यह नायाब प्याला ऐसा है कि इसमें रखे जाने वाले खाने में अगर जहर है तो वह रंग बदल देता है। इसके अलावा मोरछल जानमाज भी काफी पुराना है। झाडफ़ानूस में इस्तेमाल होने वाले राजा भागलमल के समय के शुतरमुर्ग के अंडे भी रखे गए हैं।
छूने से टूट जाती अकबर की चादर
बादशाह अकबर ने यहां पर मलमल की एक चादर चढ़ाई थी। यह चादर पुरानी होने के कारण छूने भर से टूटने लगती है। सराय घाट के पुल पर जहांगीर का लगाया गया शिलालेख यहां की पुरातन संपदा का प्रतीक है। इसे दरगाह में सुरक्षित करके रखा गया है।
देश भर से आते मलंग
दरगाह पर उर्स के दौरान देश भर से मलंग यहां आते हैं। ये मलंग अपने सिर के बाल नहीं काटते जो करीब ८०-८० फीट तक लंबे भी होते हैं। ये लोग पाकर के पेड़ के पास जाकर मन्नते मांगते हैं।