जिला जेल में खिलौनों संग खेलते हैं मासूम, पर बचपन नहीं है आजाद, अपराध की दुनिया में महिलाएं ना रखें कदम
कटनी. नन्ही सी जान, न कोई अपराध, न कसूर, फिर भी जेल की दीवारों में कैद मासूमियत, भोजन, दूध और खिलौनों के बाद भी खालीपन, सलाखों के पीछे खुली हवा वाली मासूमों की छिनती मुस्कान…। यह कुछ क्षणों के लिए बिचलित कर देने वाला क्षण हैं जिला जेल झिंझरी का। कहते हैं बच्चे भगवान का रूप होते हैं, लेकिन जिला जेल की ऊंची दीवारों और लोहे की सलाखों के बीच तीन मासूम अपना बचपन गुजारने को मजबूर हैं। ये बच्चे किसी गुनाह के दोषी नहीं, बल्कि अपनी माताओं के अपराधों की सजा भुगत रहे हैं। एक बच्चा हत्या के आरोप में बंद महिला के साथ है, जबकि दो मासूम अपनी मां के साथ हैं, जो गांजा तस्करी में विचाराधीन बंदी है।
जानकारी के अनुसार मार्च माह में हत्या के आरोप में एक महिला बंदी है, जिसके साथ दो साल का बच्चा भी संग रहने विवश है। इसी प्रकार दिसंबर 2024 में गांजा तस्करी में एक महिला बंद है, जिसके साथ 3 वर्ष छह माह का मासूम भी है। इसी तरह दिसंबर माह में गांजा तस्करी में ही एक महिला विचाराधी बंदी है, जिसके साथ एक साल का बच्चा साथ है।
जेल की ऊंची दीवारों और कैद की चादर में ये बच्चे अपनी जिंदगी काट रहे हैं। खेलने-कूदने, स्कूल जाने और खुलकर सांस लेने की उम्र में वे सलाखों के पीछे सिमटकर रह गए हैं। अपराध भले ही मां ने किए हों, पर उनके दुष्परिणाम मासूम जिंदगी पर भारी पड़ रहे हैं।
जिला जेल अधीक्षक प्रभात चतुर्वेदी ने बच्चों के लिए मानवीय पहल की है। माताओं को मिलने वाले आहार के अलावा इन बच्चों के लिए अलग से दूध, फल और पौष्टिक भोजन की व्यवस्था की गई है। साथ ही खिलौने भी दिए जाते हैं, ताकि उनकी मासूमियत कैदखाने में खो न जाए और वे थोड़ी बहुत मुस्कान के साथ अपना बचपन जी सकें। दोषी नहीं फिर भी उन्हें जेल की कठोर जिंदगी जीनी पड़ रही है। मां के गुनाहों ने उनके जीवन की राहें कैद कर दी हैं। कानून के दायरे में माताएं तो अपने गुनाहों की सजा भुगत रही हैं, पर बच्चों के हिस्से में भी वही अंधेरा और बेबसी आ गई है।