पैदा होने से लेकर रोजमर्रा की जिंदगी और मृत्यु के बाद लगने वाले समान का नगर में एकमात्र ठिकाना झंडाबाजार है। अंग्रेजी शासनकाल से लेकर आज तक लोगों की पसंद व विश्वास की परंपरा इस बाजार को लेकर कायम है और इसी के चलते सुबह से देर रात तक लोगों की भीड़ यहां देखने को मिलती है। चूड़ी, बिंदी, किराना, अनाज, कपड़ा, सराफा से लेकर सब्जी तक इस स्थान में लोगों को मिलती है और इसी के चलते नगर के अलावा पूरे जिले से खरीदी करने लोग पहुंचते हैं।
बाजार की बनावट भी पूर्वजों ने ऐसी बनाई है कि शहर के किसी भी कोने से लोग इसमें प्रवेश कर सकते हैं। चारों दिशाओं से रास्ते के साथ गोलाकार बने बाजार में एक ओर कपड़ा, मनिहारी,रूई बाजार के तो दूसरी ओर सराफा बाजार है। तीसरी ओर थोक दुकानों के साथ कृषि उपकरणों की दुकानें और चौथी ओर अनाज का व्यापार होता है। बीचों-बीच किराना, सब्जी, फल सहित रोजमर्रा के काम में आने वाली दुकानों के कारण लोग इस बाजार को पसंद करते हैं।
बाजार के व्यापारियों ने बताया कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी झंडाबाजार में व्यवसाय करते आ रहे हैं और लगातार इसमें आने वालों की संख्या में इजाफा ही हुआ है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले ग्राहक ऐसे हैं, जो वर्षों से निर्धारित दुकानों से ही खरीदी करते हैं और पैसे का लेनदेन भी विश्वास में कायम है।
किराना व्यापारी पप्पू छिरौल्या ने बताया कि आजादी से पहले कच्ची दुकानों के साथ पूरा बाजार मैदान हुआ करता था। धीरे-धीरे विकास होता गया और अब नगर निगम के साथ निजी प्रतिष्ठानों के बन जाने से रौनक बढ़ गई है। व्यापारियों ने बताया कि पहले किराना, अनाज, कपड़ा, सराफा और मनिहारी की दुकानें की हुआ करतीं थीं लेकिन अब अन्य सामग्री भी यहां पर लोग को मिलने लगी हैं। पूर्वजों के जमाने से झंडाबाजार नगर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की पसंद रहा है। सभी सामग्री एक ही स्थान पर मिलने के कारण लोगों को सुविधा होती है और यही कारण है कि वर्षों से इसकी रौनक बरकरार है।