निमाड़ में मिर्ची, अरबी, मक्का के साथ उद्यानिकी फसलों का रकबा हर साल बढ़ रहा है। पिछले छह साल से लगातार संतरे की खेती का रकबा बढ़ा है। तीन साल में एक हजार पौधों से बढ़कर एक लाख पौधों का बगीचा, इससे कई किसानों को हर साल 35-40 लाख रुपए की हो रही आय हो रही है।
निमाड़ में मिर्ची, अरबी, मक्का के साथ उद्यानिकी फसलों का रकबा हर साल बढ़ रहा है। पिछले छह साल से लगातार संतरे की खेती का रकबा बढ़ा है। तीन साल में एक हजार पौधों से बढ़कर एक लाख पौधों का बगीचा, इससे कई किसानों को हर साल 35-40 लाख रुपए की हो रही आय हो रही है।
खंडवा में छह साल के भीतर संतरे की खेती का रकबा सौ गुना बढ़ा है। दो हेक्टेयर से शुरु होकर 200 हेक्टेयर में खेती शुरु हो गई है। यही नहीं खेती के साथ ही यहां के संतरे की डिमांड सीमावर्ती राज्यों में बढ़ गई है। पंधाना, छैगांव का संतरा महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब, हरियाणा की जिंदगी में मिठास घोल रहा है। संतरे के बगीचे से किसानों को हर साल 35-40 लाख रुपए की आय हो रही है। यहां की मिट्टी के संतरे की खास बात यह कि भरपूर पोषक तत्व से लैस है।
शिक्षक की नौकरी छोडऩे के बाद सुरेश पटेल ने अपने तीन दोस्तों महेश और नितेश के साथ अलग-अलग गांव में नागपुरी संतरे की खेती शुरू की। सुरेश ने दो हेक्टेयर में एक हजार पौधों से बगीचा तैयार किया। चार साल बाद उत्पादन शुरु हुआ। उत्पादन बेहतर देखकर 5500 पौधों का बगीचा तैयार किया। बगीचे से हर साल 35-40 लाख रुपए की आय हो रही है।
जिले में दो हेक्टेयर एरिया में संतरे की खेती शुरुआत हुई थी। अब 200 हेक्टेयर में पहुंच गई है। पंधाना के सुरेश पटेल ने छह साल पहले नागपुरी प्रजापति के पौधों का दो हेक्टेयर में बगीचा तैयार किया। अमरावती से नागपुरिया प्रजाति के प्रति पौधे 25 रुपए में खरीदी की थी। उत्पादन अच्छा मिलने पर 16 एकड़ में संतरा और 11 एकड़ में मौसंबी का बगीचा तैयार किया है। 55 हजार पौधों का बगीचा तैयार किया है।
अहमदपुर खैगांव निवासी सुरेश ने बताया कि पहले साल दो हेक्टेयर में 15 से 20 टन उत्पादन हुआ। ढाई लाख रुपए की आय हुई थी। शुरुआत में लोकल मार्केट के कारण कीमत कमी मिली। बाहर के व्यापारी आने लगे। 16 एकड़ में बगीचा तैयार है। दूसरे साल 40 लाख रुपए की आय हुई। तीसरे साल 58 और इस बार 45 लाख का संतरा बिका है। चंडीगढ़ के व्यापारी प्रति टन तीस हजार रुपए में खरीदकर ले गए।
शुरूआत में बगीचा तैयार करने में प्रति एकड़ दस हजार रुपए खर्च आता है। मेंटेनेंस और सिंचाई समेत अन्य खर्च औसत पांच से छह हजार रुपए होता है। दवा और पानी का छिड़काव ड्रोन कैमरे से करते हैं।
साल में दो बार फल का उत्पादन होता है। चालू सीजन में दिसंबर, जनवरी में फेल आते हैं। फरवरी ओर मार्च में फल आ जाता है। इससे पहले जून और जुलाई में फल आता है।
छैगांव माखन के सहायक उद्यानिकी अधिकारी ओपी पाटीदार का कहना है कि यहां की मिट्टी के संतरे में भरपूर पोषक तत्व है। परीक्षण में पाया गया है कि विटामिन सी का स्रोत अच्छा है। मिठास के साथ इसमें विटामिन एक व विटामिन बी-7 और फोलिक एसिड-9 आदि पोषक पर्याप्त मात्रा में है। रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके पोषक से त्वचा और हृदय को फायदा पहुंचाता है।
जिले में 200 हेक्टेयर में खेती संतरा की खेती हो रही है। इसकी शुरुआत पंधाना क्षेत्र के एक गांव में छह साल पहले दो हेक्टेयर में शुरु हुई थी। उत्पादन अच्छा होने से हर साल रकबा बढ़ रही है। संतरे की डिमांड भी बाहर बढ़ी है।