पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में भारी मतदान को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य की जनता का ममता दीदी पर भरोसा कायम रहेगा या मोदी का जादू चलेगा?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में भारी मतदान को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य की जनता का ममता दीदी पर भरोसा कायम रहेगा या मोदी का जादू चलेगा? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि मतदान के शुरुआती रुझान तृणमूल कांग्रेस की बड़ी जीत की ओर इशारा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब तक हुए मतदान से संकेत मिलता है कि तृणमूल जीत की स्थिति में है। हालांकि मुझे किसी पद में कोई दिलचस्पी नहीं है, मैं सिर्फ केंद्र में भाजपा सरकार का अंत चाहती हूं।
दूसरी तरफ पीएम नरेन्द्र मोदी ने दावा किया कि चार मई को मतगणना वाला दिन बंगाल में टीएमसी की 15 साल पुरानी सिंडिकेट प्रणाली और महा जंगलराज की समाप्ति का दिन होगा। उन्होंने दावा किया कि राज्य में भारी मतदान से संकेत मिलता है कि तृणमूल कांग्रेस के भय का शासन भाजपा द्वारा किए गए भरोसे के वादे से निश्चित रूप से पराजित हो रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का भी कहना है कि भाजपा के पक्ष में एक अप्रत्याशित जनादेश लेकर आने वाला है। भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। मौजूदा संकेतों के आधार पर लग रहा है कि हम बंगाल में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार का गठन करने जा रहे हैं। बंगाल में 152 सीटों के लिए पहले चरण का मतदान गुरुवार को संपन्न हुआ, जबकि शेष 142 सीटों के लिए दूसरे और अंतिम चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा। मतगणना 4 मई को होगी।
वैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति और राज्य के मतदाताओं का रुझान हमेशा से विश्लेषकों के लिए शोध का विषय रहा है। आमतौर पर जब-जब मतदान के प्रतिशत में रेकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है, तब-तब सत्ता के गलियारों में बड़े बदलाव देखे गए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारी मतदान अक्सर मौजूदा सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से और बदलाव की इच्छा का संकेत माना जाता है। मौजूदा सरकार को फिर लाने में अक्सर मतदाता उदासीन नजर आते हैं, जबकि सत्ता परिवर्तन के लिए लोग मतदान के लिए उमड़ पड़ते हैं। राज्य में 1962 में जब कांग्रेस का दबदबा था तब मतदान केवल 53% था, लेकिन 1967 में जब यूनाइटेड फ्रंट एक विकल्प के रूप में उभरा तो मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.5% हो गया। 2011 में भी यही रुझान देखा गया। सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विवादों के कारण लेफ्ट फ्रंट के खिलाफ लोगों में भारी असंतोष था। इसका नतीजा यह हुआ कि राज्य में रेकॉर्ड 84.33% मतदान हुआ। 34 साल पुराना वाममोर्चा का किला ढह गया और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता का स्वाद चखा।
इस बार के चुनाव में एसआईआर एक बड़ा मुद्दा रहा है। इस बार राज्य से करीब 91 लाख लोगों के नाम काटे गए। जानकारों का मानना है कि इस प्रक्रिया का सीधा असर मतदान और चुनाव परिणाम पर पड़ेगा। पहले चरण में पश्चिम बंगाल में शाम 5 बजे तक 89.93 फीसदी मतदान हुआ है जो 2021 के 77.99 फीसदी की तुलना में 11.91 फीसदी ज्यादा है। मतदान खत्म होने के बाद ये आंकड़ा और बढ़ भी सकता है। भारी मतदान की बड़ी वजह एसआईआर को भी माना जा रहा है। भारी मतदान का फायदा किसी एक दल को ज्यादा हो सकता है। सीएम ममता बनर्जी का दावा है कि बंपर वोटिंग एसआईआर के खिलाफ बंगाल का जनादेश है, पर सच यह भी है कि बंगाल में भारी मतदान एक सामान्य प्रक्रिया है। अब चार मई को ये साफ हो जाएगा कि इस बार आखिर जनता ने बदलाव के लिए मतदान किया है या फिर दीदी को एक बार फिर सत्ता तक पहुंचाने के लिए।
2026- 89.93% (शाम 5 बजे तक)
2021- 82.30%
2016 - 83.02%
2011- 84.33%
2006 - 81.97%
2001 - 75.29%