
कोटा . इशानी और सुहानी ये दोनों बेटियां पढऩे में जितनी होनहार हैं उतनी ही अभावग्रस्त परिस्थितियां उनके साथ हैं। किन्तु इसके बावजूद भी अगर उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा कहीं से मिलती ही तो वो है खुद उनकी मां, सीमा। अपनी बच्चियों के सपनों को पूरा करने का मन में जज़्बा लिए, सुबह से शाम तक मेहनत का कार्य करने वाली ये मां घर की ज़िम्मेदारियों का भी बड़ी कुशलता से निर्वहन करती है |
जब पति को हो गया लकवा, कन्धों पे आई ज़िम्मेदारियाँ
करीब दो साल पहले रामगंजमंडी की कृषि उपज मंडी में काम करते समय सीमा के पति सीताराम के एक हाथ में लकवा हो गया था। इससे परिवार की आजीविका चलाने में दिक्कत आने लगी, पति की बीमारी और परिवार की तीन बालिकाओं को शिक्षित करने के कार्य में भी जब विघ्न होने लगा तो खुद सीमा ने अपने परिवार को सँभालने और बच्चियों के सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाया।
घर का खर्च और तीन बेटियों की शिक्षा दीक्षा की जिम्मेदारी लेकर उसने लोगों के घरो में साफ सफाई करने का कार्य चालू किया। सुबह आठ बजे से दिन में एक बजे तक वह घरों में सफाई करती है। इसके बाद अपने बच्चों को संभालती है। शाम को 4 से 8 बजे के बीच में उसका फिर से घरों में सफाई करने का दौर चालू हो जाता है। पति सीताराम दिन में स्कूल से घर आने वाली अपनी बेटियों को पढ़ाने में लगे रहते हैं। बच्चों के छोटे-मोटे कार्य भी वह कर लेता है।
इशानी का सपना टीचर बनना तो सुहानी बनना चाहती है डॉक्टर
सीमा की तीन बेटियां इशानी, सुहानी और अंजलि है। इशानी टीचर बनना चाहती है और सुहानी डॉक्टर तो तीसरी बालिका अंजली का इसी साल स्कूल में दाखिला करवाया है। बच्चियों को आगे बढ़ाने का जज्बा व अपने घर के कर्तव्यों के प्रति सजग रहने वाली सीमा का सपना है कि उसकी पुत्रियों के सारे ख्वाब उसके जीवन में रहते पूरे हो।
मेहनत चाहे जितनी करनी पड़े, बस बेटियों को पढ़ाना है
पढ़ाई में खर्च ज्यादा होने की बात पर सीमा कहती है कि मेहनत चाहे कितनी भी करनी पड़े, मेरी बेटियों का सपना पूरा करना मेरे जीवन का लक्ष्य है। अपने बच्चों के लिए एक आदर्श और अपने परिवार के लिए आदर्श गृहणी बनी सीमा आज के इस दौर में समाज के लिए भी एक प्रेरणा है एक आदर्श है|