
रावतभाटा. कटहल का उत्पादन अब रावतभाटा में होने लगा है। भैंसरोडगढ़ चंबल किनारे का कटहल का स्वाद अब कोटा के लोग भी ले रहे हैं। यहां से बाहर के व्यवसायी आकर थोक में कटहल लेकर जाते हैं। खेतों में उगे कटहल के पेड़ यहां के किसानों की आमदनी का एक बेहतर जरिया है। देवपुरिया में महेंद्र सिंह और बृजमोहन कोली के खेतों में इस बार अच्छा उत्पादन हुआ है।
रुचिकर व्यंजनों में होता है उपयोग
कई किसानों के लिए खरीफ की खेती कटहल पर ही टिकी होती है। किसान गर्मी के सीजन में कटहल की बिक्री कर उससे अर्जित होने वाली रकम से खरीफ की खेती के लिए खाद, बीज आदि खरीदते हैं। हालांकि कटहल के पेड़ों की संख्या में कमी जरूर आ रही है। लेकिन किसान अब भी नए कटहल के पौधे लगाते हैं। कटहल से किसानों को होने वाले फायदे पर गौर करें तो मार्च माह से ही किसानों को कटहल से लाभ मिलना शुरू हो जाता है। मार्च माह तक पेड़ों में फसल आना शुरू हो जाती है। इस वक्त नई सब्जी के रूप में मंडी में कटहल की डिमांड ज्यादा होती है। छोटे साइज के कटहल को किसान इस अवधि में बाजार में अधिक कीमत पर बेचते हैं। अप्रैल, मई और जून महीने में कटहल अपने पूर्ण आकार में आ जाता है। इस वक्त पेड़ों पर लदे एक कटहल का वजन 5 से 30 किलोग्राम तक होता है। इसकी बिक्री भी किसान स्थानीय मंडियों में करते हैं। इसका साधारणतः उपयोग रूचिकर व्यंजन के रूप में किया जाता है। कटहल गरीबों का पनीर के रूप में जाना जाता है। सब्जी के अलाव भी कटहल की अन्य कई उपयोगिताएं हैं। कुछ गृहणियां कटहल का अचार बनाकर इसे घरों में संग्रहित करके रखती हैं। इसके अलावा पके हुए कटहल को भी लोग चाव से खाते हैं।