- कभी चलता था सिक्का, अब गुमनाम बूढऩहेड़ा गांव
मोईकलां. जिले की अंतिम सीमा पर स्थित बूढऩहेड़ा गांव कभी जागीरदारों के लिए आन-बान हुआ करता था। धीरे-धीरे जागीरदारी प्रथा खत्म हुई। आज मोईकलां क्षेत्र के बूढऩहेड़ा गांव का नाम भले ही जाना पहचाना हो पर अब सिर्फ गांव नाम का रह गया है।
बूढऩहेड़ा गांव का नाम बपावर थाना क्षेत्र के नक्शे व राजस्व रेकार्ड में दर्ज तो है पर गांव ना होने के बराबर है। जागीरदारी के समय गांव में १२ हाथी और ४५ घोड़े हुआ करते थे। हजारों बीघा जमीन के मालिक जागीरदार हुआ करते थे। किसी जमाने में गांव का नाम बड़ी शान व मान-सम्मान से लिया जाता था। आज गांव की स्थिति यह है कि बस्ती के नाम पर सिर्फ दो कच्चे टूटे-फूटे मकान है। एक मकान में अब्दुल सलीम और दूसरे में अब्दुल अली रहते है। दोनों भाईयों ने बताया कि जागीरदारी के समय शीतला माता के मंदिर के नाम ४० बीघा, देवनारायण मंदिर के नाम पर ११ बीघा, कंकाली माता मंदिर के नाम ६ बीघा, मस्जिद के नाम ११ बीघा और भैरूजी के नाम ११ बीघा जमीन निकाली गई थी।
मौका स्थिति को देखकर पता चला कि जमीन का उपयोग करने वाले वर्ष में कभी-कभार ही यहां की देखरेख करने आते है। सलीम व अली ने बताया कि हर दिन सुबह उठते ही कंकाली माता व भोलेनाथ के दर्शन करने के बाद ही काम शुरू करते हैं। गांव के अंदर व बाहर चारों और हिन्दू धर्म के मंदिर व देवी-देवता स्थित है। सिर्फ मस्जिद को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी जगह की देखरेख सलीम व अली करते हैं। गांव का नाम सरकारी फाइलों के अलावा कहीं पर भी लिखा हुआ नहीं है।कब-कब किसकी जागिरी में रहा गांवबूढऩहेड़ा निवासी अब्दुल अली ने बताया कि ७५० वर्ष तक खींची राजपूतों, १०० वर्ष बीकावत, ६४९ वर्ष केशर खां पठान ने गांव की जागिरी संभाली। अली ने बताया कि ४३८ वर्ष पूर्व सम्वंत १६३७ पौष बद्धी छठ को गांव आमद खां की जागिरी में आया। उस समय भी यहां हजारों बीघा जमीन हुआ करती थी। अली ने भावुक होते हुए बताया कि उनके पास आज एक बीघा भी जमीन नहीं है।
पटवार हल्के में आज भी रकबा ज्यादा
लटूरा हल्का पटवारी धनवीर मीणा ने बताया कि लटूरा पटवार हल्के में आधा दर्जन गांव आते है। आज भी बूढऩहेड़ा गांव में १४०० बीघा का सबसे ज्यादा रकबा है। पटवारी मीणा ने बताया कि गांव पूरी तरह से उजड़ चुका है। गांव में ३३८ बीघा सरकारी जमीन मौजूद है। गांव की स्थिति यह है कि जानकार ही गांव तक पहुंच सकता है। पुराने टीले पर दो कच्चे मकान दिखते है।
कभी कोई नहीं आता
दोनों परिवार के लोगों ने बताया कि गुमनाम गांव को रोशनी दिखाने की कभी किसी ने कोशिश नहीं की। उनके यहां पर तो कोई आता भी है तो बस चुनाव के समय। वर्ष में एक-दो बार साफ-सफाई करने के बाद मस्जिद में नमाज अदा करते हैं। हां मंदिरों में अगरबत्ती जरूर रोज लगाते हैं। दोनों परिवार की कंकाली माता पर काफी गहरी आस्था है।
शेर भी पीछे हट गया
अली ने बताया कि उनके परदादा नियामत खां लतीफ खां को जंगल घूमने का शौक था। एक दिन उनके सामने शेर आ गया। शेर ने उन पर हमला तो किया पर दोनों के साहस व बहाुदरी के सामने शेर को अपना रास्ता बदलना पड़ा था। उन्होंने बताया कि किसी जमाने में उनके परिवार का नाम चलता था। पर आज गांव का नाम ही गुमनाम हो गया है।