Holi Kavita: आज के इस लेख में हम हरिवंश राय बच्चन और भगीरथ पेंसिया जी द्वारा लिखी गई होली कविताएं आपके साथ साझा कर रहे हैं। आप इन खूबसूरत कविताओं को पढ़कर होली के रंगों का आनंद ले सकते हैं और इन्हें अपने सोशल मीडिया पर शेयर कर अपने दोस्तों और अपनों को होली की ढेरों शुभकामनाएं भी दे सकते हैं।
Holi Kavita: होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह खुशियां बांटने, रिश्तों को फिर से मजबूत करने और दिलों को करीब लाने का खास दिन है। आज पूरे देश में होली बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाई जा रही है। सुबह से ही गलियों में रंग और गुलाल उड़ रहे हैं, बच्चे पिचकारी लेकर मस्ती कर रहे हैं और घरों में स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू माहौल को और भी खास बना रही है। इस खास अवसर पर लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और प्यार व अपनापन बांटते हैं। होली की यही खूबसूरती कविताओं में भी नजर आती है। रंग, उमंग, दोस्ती और प्रेम के भावों से सजी होली की कविताएं सीधे दिल को छू जाती हैं।
आज के इस लेख में हम हरिवंश राय बच्चन और भगीरथ पेंसिया जी द्वारा लिखी गई होली कविताएं आपके साथ साझा कर रहे हैं। आप इन खूबसूरत कविताओं को पढ़कर होली के रंगों का आनंद ले सकते हैं और इन्हें अपने सोशल मीडिया पर शेयर कर अपने दोस्तों और अपनों को होली की ढेरों शुभकामनाएं भी दे सकते हैं।
हरिवंश राय बच्चन द्वारा लिखी गई होली की कविताएं
1- यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,
आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!
निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,
आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!
प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,
जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो !
2- यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,
आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!
निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,
आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!
प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,
जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
साभार : हरिवंश राय बच्चन
भगीरथ पेंसिया द्वारा लिखी गई होली की कविताएं
1-ज़ल गई ज़लनख़ोर
प्रफुल्लित प्रहलाद है
हर कोई साद यहां
ना कोई विषाद है
मौका है दस्तूर भी है
आज लग जाओ गले
बहाने से ही बांट दो
जो होली का प्रसाद है
आज है अवसर
मांग लो माफ़ी
और वक्त है कर दो माफ़
खत्म कर दो अब प्रेम से
जो कोई विवाद है
2- हम ऐसे ही हैं भाई
जैसे ऋतु ये बौराई
जैसे सर्दियों को
धक्का देकर
बसंती है आई जैसे
आज हर चौपाल पर
चंग की धमाल पर
हेला-ए-होली जैसे
रंग है रंगोली है
गली गली घूमती है
छिछोरों की टोली जैसे
ठण्डाई की मांग पर
थोड़ी सी भांग जैसे
गुज़िया का टेस्ट जैसे
बिन बुलाये गेस्ट जैसे
आज यहां काम न आए
थोड़ी सी भी शरीफ़ाई
हम तो ऐसे ही हैं भाई
साभार : भगीरथ पेंसिया