लक्ष्मी कांत बाजपेई की वर्तमान में उपेक्षा के चलते कुछ लोग उनकी तुलना लाल कृष्ण आडवाणी से करते हुए उन्हें यूपी भाजपा का आडवाणी बता रहे हैं।
लखनऊ. उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मी कांत बाजपेई की वर्तमान में उपेक्षा के चलते कुछ लोग उनकी तुलना लाल कृष्ण आडवाणी से करते हुए उन्हें यूपी भाजपा का आडवाणी बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस तरह के मैसेज लिखे जा रहे हैं और भाजपा के इस वरिष्ठ नेता की उपेक्षा को लेकर कई तरह की अटकलें जाहिर की जा रही है। भाजपा ने इस समय एमएलसी के 10 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं जिनमें कई संगठन के पदाधिकारी तो कई मंत्रिमंडल के सदस्य हैं। इसके साथ ही बाहर से आये कई नेताओं को भी एमएलसी कैंडिडेट बनाया गया है लेकिन बाजपेई का नाम सूची से नदारद है। इससे पहले राज्यसभा चुनाव में भी लक्ष्मी कान्त बाजपेई के नाम को उपेक्षित किया गया था।
बाहरी नेताओं को प्राथमिकता
इस बार एमएलसी के जो प्रत्याशी घोषित किये गए हैं, उनमें से चार बाहरी प्रत्याशी हैं। डॉ लक्ष्मी कान्त बाजपेई भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और उनकी गिनती संघर्षशील और जमीनी नेताओं में की जाती है। उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा के सरकार में आने के बाद से लक्ष्मी कान्त बाजपेई साइडलाइन हैं। पार्टी उन्हें ऊपरी तौर पर भले ही महत्वपूर्ण नेता बता रही हो लेकिन भीतरी तौर पर बाजपेई के खिलाफ चल रही लामबंदी समझी जा सकती है। इसी का नतीजा है कि बाहर से कुछ दिनों पहले पार्टी में आये नेताओं को भाजपा एमएलसी बनाने जा रही है और लक्ष्मी कांत बाजपेई को उपेक्षित किया गया है।
पार्टी बचाव में दे रही तर्क
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी इस पूरे मामले को लेकर अलग ही तरह के तर्क देती है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हरिश्चंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि पार्टी के अवसरों को लेकर निर्णय शीर्ष नेतृत्व तय करता है। विभिन्न अवसरों पर उनमें विचार होता है। सभी नेताओं की उपयोगिता पार्टी के विचार में रहती है। संभव है पार्टी को किसी अन्य महत्वपूर्ण स्थान पर उनका उपयोग करना हो।