कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह ने विधानसभा में बिजली विभाग की विजिलेंस छापेमारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पिछले तीन वर्षों से जनता इन कार्रवाइयों से त्रस्त है। पारदर्शिता की मांग करते हुए उन्होंने विजिलेंस टीमों की निगरानी के लिए अलग व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई।
Kunda MLA Raghuraj Pratap Singh Targets Power Vigilance Raids: उत्तर प्रदेश विधानसभा में बिजली विभाग की विजिलेंस टीमों द्वारा की जा रही छापेमारी को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई। कुंडा से विधायक Raghuraj Pratap Singh ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि पिछले तीन वर्षों में जनता विजिलेंस की कार्रवाई से बेहद त्रस्त है। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “इन विजिलेंस वालों के पीछे भी विजिलेंस की एक और टीम लगानी पड़ेगी, ताकि इनके काले कारनामों को पकड़ा जा सके।”
विधानसभा की कार्यवाही के दौरान रघुराज प्रताप सिंह ने कहा कि बिजली चोरी रोकने के नाम पर चल रही छापेमारी की कार्रवाई कई जगहों पर उत्पीड़न का रूप ले चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि आम नागरिकों और छोटे व्यापारियों को बिना पर्याप्त जांच के परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा, “बिजली विभाग की विजिलेंस टीमों का मकसद कानून का पालन कराना होना चाहिए, लेकिन कई जगह यह कार्रवाई दबाव और वसूली का माध्यम बनती दिख रही है। जनता बहुत परेशान है।”
कुंडा विधायक ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में उनके क्षेत्र सहित कई जिलों से विजिलेंस टीमों के खिलाफ शिकायतें मिल रही हैं। लोगों का आरोप है कि मामूली तकनीकी खामियों या मीटर की गड़बड़ी को भी बिजली चोरी बताकर भारी जुर्माना लगाया जाता है। उन्होंने सदन में कहा कि यदि किसी के खिलाफ ठोस सबूत हैं तो निश्चित रूप से कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन निर्दोष लोगों को परेशान करना ठीक नहीं है।
रघुराज प्रताप सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि जिस तरह विजिलेंस टीम जनता की निगरानी करती है, उसी तरह इन टीमों की कार्यप्रणाली की भी स्वतंत्र निगरानी होनी चाहिए। उनका कहना था, “इन विजिलेंस वालों के पीछे भी विजिलेंस की टीम लगानी पड़ेगी। तभी इनके काले कारनामे सामने आएंगे।” उनके इस बयान के बाद सदन में हलचल तेज हो गई। कुछ सदस्यों ने मेज थपथपाकर समर्थन किया, जबकि सत्ता पक्ष के कुछ सदस्यों ने आपत्ति भी जताई।
हालांकि सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि बिजली चोरी रोकने के लिए विजिलेंस की कार्रवाई जरूरी है। अधिकारियों का कहना है कि राज्य में बिजली चोरी से राजस्व को भारी नुकसान होता है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर भी असर पड़ता है। सरकारी पक्ष का तर्क है कि छापेमारी कानून के तहत की जाती है और यदि किसी को शिकायत है तो वह उच्च अधिकारियों के समक्ष अपील कर सकता है।
विधानसभा में उठे इस मुद्दे के बाद कई उपभोक्ताओं ने राहत की उम्मीद जताई है। छोटे दुकानदारों और ग्रामीण क्षेत्रों के उपभोक्ताओं का कहना है कि कभी-कभी मीटर की तकनीकी खराबी या बिलिंग त्रुटि को भी चोरी मान लिया जाता है।
कुछ लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जांच के दौरान भाषा और व्यवहार भी कठोर होता है, जिससे आम नागरिक भयभीत हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली चोरी रोकना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र भी उतना ही जरूरी है। यदि विजिलेंस टीमों की कार्रवाई में पारदर्शिता और रिकॉर्डिंग की व्यवस्था हो, तो विवाद कम हो सकते हैं।
डिजिटल मीटरिंग, ऑनलाइन शिकायत निवारण और स्वतंत्र निगरानी तंत्र जैसी व्यवस्थाएं इस दिशा में कारगर साबित हो सकती हैं।