
पत्रिका न्यूज नेटवर्क @ लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी में उत्तराधिकार की कहानी एक बार फिर वहीं पहुंच गई है, जहां से सवाल शुरू हुआ था। मायावती ने जिस भतीजे आकाश आनंद को कभी अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाकर दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व का चेहरा बनाया था, अब उसी आकाश को पार्टी से बाहर कर दिया है। 3 सितंबर को राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी छीनने के बाद 10 सितंबर को मायावती ने उन्हें बसपा से पूरी तरह मुक्त करने का ऐलान किया। यानी पिछले करीब तीन वर्षों में आकाश को लेकर बनी उम्मीद, टूटे भरोसे, दोबारा दिए गए मौके और फिर हुए टकराव का सिलसिला अब फिलहाल खत्म हो गया है।
यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है। बसपा के सामने एक तरफ संगठन को फिर से सक्रिय करने और दूसरी तरफ अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बचाए रखने की चुनौती है। ऐसे में पार्टी के घोषित उत्तराधिकारी का बाहर होना केवल एक पद का बदलाव नहीं है, बल्कि बसपा की अगली पीढ़ी के नेतृत्व को लेकर बड़ा सवाल भी है।
मायावती के हालिया बयानों में आकाश के साथ-साथ उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ का भी लगातार जिक्र आया है। यही इस पूरे प्रकरण की सबसे अहम राजनीतिक कड़ी बनकर सामने आई है।
आकाश आनंद ने मार्च 2023 में डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ से विवाह किया। प्रज्ञा, बसपा के पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ की बेटी हैं। इसके बाद आकाश की निजी जिंदगी और पार्टी की राजनीति के बीच एक नया रिश्ता बना। अशोक सिद्धार्थ बसपा के पुराने नेताओं में रहे हैं और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।
राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र प्रताप सिंह का मानना है कि मायावती ने आकाश के खिलाफ हालिया कार्रवाई में जिस तरह पारिवारिक प्रभाव और पार्टी संगठन के बीच संतुलन का सवाल उठाया, उससे यह स्पष्ट हुआ कि विवाद केवल आकाश के व्यक्तिगत राजनीतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। पार्टी नेतृत्व ने इसे संगठनात्मक अनुशासन और राजनीतिक प्राथमिकताओं के सवाल के रूप में देखा। अशोक सिद्धार्थ को पहले ही पार्टी से बाहर किया जा चुका था। इसके बाद मायावती ने आकाश की भूमिका पर भी फैसला किया। सिद्धार्थ ने 10 सितंबर को राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की, लेकिन इसके बाद भी आकाश की पार्टी में वापसी नहीं हुई। उलटे उसी दिन मायावती ने उन्हें बसपा से पूरी तरह अलग कर दिया।
आकाश आनंद का बसपा में उभार अचानक नहीं हुआ था। मायावती ने उन्हें धीरे-धीरे संगठन की जिम्मेदारियों में आगे बढ़ाया। 2019 के बाद वह पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए और युवाओं के बीच संगठन विस्तार की जिम्मेदारी संभाली। दिसंबर 2023 में लखनऊ में हुई बसपा की राष्ट्रीय बैठक में तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई। मायावती ने आकाश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया। इसके साथ ही वह पार्टी की अगली पीढ़ी का सबसे बड़ा चेहरा बन गए। हालांकि यह राजनीतिक उड़ान लंबी नहीं चली।
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान सीतापुर में आकाश के भाषण को लेकर विवाद हुआ। इसके बाद मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक और उत्तराधिकारी दोनों पदों से हटा दिया। उस समय उनके फैसले का आधार आकाश की राजनीतिक अपरिपक्वता को बताया गया। फिर छह सप्ताह के भीतर तस्वीर बदल गई। लोकसभा चुनाव में बसपा के खराब प्रदर्शन के बाद मायावती ने आकाश को दोबारा राष्ट्रीय समन्वयक बनाया और उत्तराधिकारी का दर्जा भी बहाल कर दिया। यानी जिस युवा चेहरे को पहले अनुभव की कमी के कारण पीछे किया गया, उसी को पार्टी ने चुनावी झटके के बाद फिर आगे कर दिया।
पिछले साल आकाश की राजनीतिक कहानी ने फिर करवट ली। उन्हें दोबारा पार्टी की जिम्मेदारियों से हटाया गया। इसके बाद आकाश ने मायावती से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बताया। मायावती ने फिर उन्हें मौका दिया। मई 2025 में आकाश को बसपा का मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया। इस बार जिम्मेदारी पहले से ज्यादा व्यापक थी। संदेश यह था कि आकाश को पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका दी जा रही है। हालांकि एक साल से कुछ अधिक समय बाद यह प्रयोग भी समाप्त हो गया। सितंबर में पहले राष्ट्रीय संयोजक का पद गया और अब पार्टी की सदस्यता भी चली गई।
आकाश को हटाने के साथ बसपा की राजनीति में एक और नाम तेजी से सामने आया है—ईशान आनंद। वह मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे और आकाश के छोटे भाई हैं। यहीं से बसपा की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा होता है। मायावती लगातार इस बात पर जोर देती रही हैं कि पार्टी का आधार परिवार नहीं, बहुजन आंदोलन और संगठन है। लेकिन आकाश को हटाए जाने के बाद परिवार की अगली पीढ़ी से ही ईशान आनंद की संगठन में सक्रियता चर्चा में आ गई है। अभी ईशान को लेकर आकाश जैसी औपचारिक उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए उनके नाम को आकाश के विकल्प के रूप में तय मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन बसपा की मौजूदा परिस्थितियों में उनकी बढ़ती भूमिका पर राजनीतिक नजर जरूर रहेगी।
बसपा की राजनीति लंबे समय से एक केंद्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द रही है। कांशीराम के बाद पार्टी की पूरी राजनीतिक दिशा मायावती के नेतृत्व में तय हुई। संगठन में अंतिम निर्णय का अधिकार भी उनके पास रहा। आकाश को उत्तराधिकारी बनाना इसी व्यवस्था में पहली बार बड़े पैमाने पर दूसरी पीढ़ी को आगे लाने का प्रयोग था। आकाश की शिक्षा, उनकी संचार शैली और युवाओं से संवाद का तरीका उन्हें पार्टी के पुराने नेतृत्व से अलग बनाता था। सोशल मीडिया और नई राजनीतिक भाषा के इस्तेमाल के कारण वह युवाओं के बीच बसपा का नया चेहरा बनने की कोशिश करते नजर आए। हालांकि आकाश का राजनीतिक सफर यह भी दिखाता है कि बसपा में दूसरी पंक्ति के नेतृत्व के लिए केवल युवा चेहरा होना पर्याप्त नहीं है। पार्टी नेतृत्व के साथ तालमेल, संगठनात्मक अनुशासन और मायावती की राजनीतिक कार्यशैली के अनुरूप चलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आकाश के मामले में यही संतुलन बार-बार बिगड़ा।
आकाश के बाहर होने का असर केवल बसपा के भीतर तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर दलित राजनीति में अपनी जगह बनाने वाले आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद लगातार युवा दलित मतदाताओं के बीच सक्रिय हैं। ऐसे समय में बसपा के पास आकाश जैसा अपेक्षाकृत युवा चेहरा था, जिसे मायावती ने खुद आगे बढ़ाया था। अब वह चेहरा पार्टी के बाहर है। इससे 2027 के चुनाव से पहले बसपा के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ मायावती का अपना राजनीतिक आधार और दूसरी तरफ नई पीढ़ी के मतदाताओं तक पहुंच।
राजनीतिक विश्लेषक मनमोहन का मानना है कि आकाश आनंद का निष्कासन ऐसे वक्त हुआ है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में सभी दल आगामी चुनाव की तैयारी में जुट रहे हैं। बसपा के लिए यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक आधार को बनाए रखने की भी परीक्षा है। आकाश के रूप में जिस दूसरी पीढ़ी को तैयार करने की कोशिश शुरू हुई थी, वह प्रयोग फिलहाल समाप्त हो चुका है।