लखनऊ

शिक्षा में प्रकृति और संवेदनशीलता को समझना जरूरी: कोठारी

Patrika Chief Editor Gulab Kothari Speech: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि शिक्षा में प्रकृति और संवेदनशीलता को समझने की क्षमता विकसित करना जरूरी है। उन्होंने स्त्री के मातृत्व और परिवार में भूमिका पर भी विचार रखे।
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Aug 20, 2026
Patrika Chief Editor Gulab Kothari Speech
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (फोटो पत्रिका नेटवर्क)

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था ने ज्ञान को प्रकृति, संवेदनशीलता और व्यक्तित्व निर्माण से अलग कर दिया है। पढ़ाई का लक्ष्य करियर और पेट भरने तक सीमित होता जा रहा है, जबकि प्रकृति ने स्त्री को जो विशिष्ट भूमिका दी है, उससे जुड़े विषय शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। इसका असर व्यक्ति और समाज की संवेदनशीलता पर पड़ रहा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि मनुष्य और उसके भीतर के भावों को समझने की क्षमता विकसित करना भी होना चाहिए।


कोठारी गुरुवार को अवध गर्ल्स पीजी कॉलेज में ‘स्त्री : देह से आगे’ विषय पर आयोजित विवेचन कार्यक्रम तथा फिक्की फ्लो, लखनऊ चैप्टर की ओर से हजरतगंज स्थित यूनिवर्सल बुक सेलर में आयोजित संवाद कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे। दोनों कार्यक्रमों में उन्होंने स्त्री के स्वरूप, मातृत्व, परिवार, विवाह और मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के बदलते उद्देश्यों पर विचार रखे।


अवध गर्ल्स पीजी कॉलेज में प्राचार्य डॉ. बीना राय ने स्वागत किया। डॉ. प्रीति अवस्थी ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन पत्रिका के डिप्टी एडिटर हरीश पाराशर ने किया। फिक्की फ्लो के कार्यक्रम में सिमरन साहनी, यूनिवर्सल बुक सेलर के मानव प्रकाश व राघव प्रकाश, कहानीकार प्रेरणा पांडे, एसीपी अभिषेक कुमार पांडेय सहित महिलाएं और प्रबुद्धजन मौजूद रहे।

स्थूल के साथ सूक्ष्म में जीती है स्त्री…

कोठारी ने कहा कि ईश्वर ने स्त्री को ऐसी शक्ति दी है, जिससे वह स्थूल के साथ सूक्ष्म में भी जीती है। सूक्ष्म में जीना स्त्री की विशेष क्षमता है और आत्मभाव उसकी मूल ताकत है। उन्होंने कहा कि मातृत्व महिला के जीवन का पहला स्वप्न होता है। मां को ही सबसे पहले यह अनुभव होता है कि उसके घर नया मेहमान आने वाला है। यह केवल शरीर से जुड़ी प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रकृति और संवेदना के गहरे संबंध का विषय है।
उन्होंने छोटी बच्चियों में सहज दिखाई देने वाले मातृत्व भाव का उदाहरण देते हुए कहा कि पांच-छह साल की बच्ची अपने एक-दो साल के छोटे भाई को खिलाती है, खाना खिलाती है, नहलाती और सुलाती है। वह मां की तरह व्यवहार करती है। इतनी छोटी उम्र में उसके भीतर यह मातृत्व भाव कहां से आया, इस पर चिंतन होना चाहिए। शिक्षा को ऐसे सवालों से जोड़ने की जरूरत है।

स्त्री-पुरुष युगल रूप में अर्द्धनारीश्वर…

उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष युगल रूप में अर्द्धनारीश्वर हैं। हर पुरुष के भीतर स्त्री भाव और हर स्त्री के भीतर पुरुष भाव मौजूद है। पुरुष को अपने भीतर के स्त्री भाव को कम नहीं होने देना चाहिए। जीवन को संतुलित बनाने के लिए दोनों पक्षों को समझना जरूरी है। कोठारी ने कहा कि आज पढ़ाई पेट भरने और करियर बनाने का साधन बन गई है। पढ़ाई व्यक्तित्व निर्माण और बच्चों में संस्कार डालने का काम नहीं कर रही। स्कूल-कॉलेजों में प्रतिस्पर्धा की शिक्षा के साथ प्रकृति, संवेदनशीलता और व्यावहारिक जीवन को समझने वाली शिक्षा भी जरूरी है। किताबों से मिलने वाला ज्ञान अधिकतर बाहरी है, जबकि जीवन का वास्तविक और व्यावहारिक ज्ञान अनुभव और प्रकृति से आता है।

मां के विचार और खानपान का असर संतान पर…

फिक्की फ्लो के संवाद में परिवारों में लड़के और लड़की के पालन-पोषण के बदलते तरीकों पर चर्चा करते हुए कोठारी ने कहा कि संतान का शरीर और मां का शरीर अलग नहीं हो सकता। महिला के गर्भ में आने वाला बीज ईश्वर का अंश है। बच्चे का शरीर मां के अंश, उसके शरीर और खानपान से बनता है। ऐसे में मां के खानपान के साथ उसके विचारों का भी संतान पर असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि संतान को केवल जन्म देना पर्याप्त नहीं है, उसे मनुष्य बनाना भी जरूरी है और इसमें मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

विवाह अनुबंध नहीं, दो आत्माओं का मिलन…

भारतीय परंपरा में विवाह की अवधारणा को समझाते हुए उन्होंने कहा कि विवाह दो आत्माओं का मिलन है। केवल दो शरीरों का संबंध एक तरह का अनुबंध बनकर रह जाता है। जब तक दो आत्माओं का मिलन नहीं होगा, तब तक दोनों अपने कर्मों को बांट नहीं सकते। भारतीय परंपरा में मंत्रों के माध्यम से विवाह दो आत्माओं को जोड़ने वाला संस्कार है। मंत्रों के शब्दों के स्पंदन में मातृत्व और सकारात्मकता का भाव है। इसी भाव से सात जन्मों के रिश्ते की कल्पना की गई।

महिलाएं खुद को भी समझ नहीं पा रहीं

संवाद के दौरान शहर के प्रबुद्धजनों, लेखकों, अधिकारियों और महिलाओं ने स्त्री की भूमिका और बदलते सामाजिक संबंधों को लेकर सवाल किए। कोठारी ने कहा कि स्त्री की भूमिका के बारे में किताबों और ग्रंथों में पर्याप्त चर्चा नहीं हुई है। इसे समझने की जरूरत है। आज प्रश्न यह भी है कि महिलाएं स्वयं को ही पूरी तरह नहीं समझ पा रही हैं और अपनी तकलीफ दूसरी महिला से भी साझा नहीं कर पातीं। स्त्री विमर्श को केवल अधिकार और समानता के दायरे से आगे ले जाकर उसके अस्तित्व, संवेदना और प्रकृति से जोड़कर देखना होगा।

स्त्री को समझने के पांच सूत्र…

1. देह से आगे पहचान…
स्त्री को केवल शरीर के आधार पर नहीं, उसके सूक्ष्म भाव, आत्मभाव और संवेदनशीलता के स्तर पर समझना होगा।

2. मातृत्व सहज भाव…
छोटी उम्र में बच्चियों के व्यवहार में दिखाई देने वाला मातृत्व प्रकृति से मिले स्त्रीत्व के विशिष्ट पक्ष की ओर संकेत करता है।

3. शिक्षा का उद्देश्य बदले…
करियर और प्रतिस्पर्धा के साथ शिक्षा में प्रकृति, संवेदनशीलता, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण को भी स्थान मिलना चाहिए।

4. विवाह संस्कार है…
भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो शरीरों का संबंध नहीं, बल्कि दो आत्माओं को जोड़ने वाला संस्कार माना गया है।

5. स्त्री को स्वयं को समझना होगा…
स्त्री विमर्श केवल बाहरी अधिकारों तक सीमित न रहे। स्त्री अपने भीतर के भाव, सामर्थ्य और भूमिका को समझे, यही विमर्श का अगला चरण होना चाहिए।

कल के कार्यक्रम

दोपहर 12 बजे: एसआरएम यूनिवर्सिटी, बाराबंकी
शाम 6 बजे: एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, लखनऊ

कार्यक्रमों से सीधे जुड़ने के लिए लिंक क्लिक करें अथवा क्यूआर कोड स्कैन करें

Updated on:
20 Aug 2026 10:11 pm
Published on:
20 Aug 2026 10:02 pm
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