
पत्रिका न्यूज नेटवर्क @ लखनऊ.उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच युवा वोटरों को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के युवाओं से सीधे संवाद के अभियानों और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘जेन-जी’ से संवाद के बीच समाजवादी पार्टी ने भी युवाओं को अपनी राजनीतिक रणनीति के केंद्र में रखा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने नई पीढ़ी के लिए ‘नीली वर्दी’ वाली यूथ फोर्स की अवधारणा सामने रखी है। समाजवादी छात्र सभा के सभी सदस्य यह वर्दी पहनेंगे।
अखिलेश ने इसके साथ ही पार्टी के प्रमुख राजनीतिक नारे ‘पीडीए’ की एक नई व्याख्या भी सामने रखी है। अब तक पीडीए को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक के राजनीतिक समीकरण के तौर पर इस्तेमाल करने वाली सपा ने इसे ‘पीड़ित, दुखी और अपमानित’ लोगों के समूह के रूप में भी परिभाषित किया है। इस व्याख्या के जरिए सामाजिक न्याय के मुद्दे को व्यापक सामाजिक आधार से जोड़ने की बात कही गई है।
अखिलेश यादव ने ड्रेस कोड का समर्थन करते हुए कहा कि जब नई पीढ़ी की सोच नई है तो यूनिफॉर्म भी नई होनी चाहिए। उनके अनुसार यूनिफॉर्म पहनावे के भेद से पैदा होने वाली गैर-बराबरी को खत्म कर समानता का संदेश देती है। उन्होंने नीली वर्दी को पहचान, अनुशासन, कर्तव्य के संकल्प और सद्कर्म की प्रेरणा से जोड़ा। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में तैनात यूथ फोर्स के जरिए छात्रों और युवाओं से सीधे संवाद की बात कही गई है। समाजवादी छात्र सभा के सभी सदस्यों के लिए नीली वर्दी का प्रावधान इसी संगठनात्मक पहल का हिस्सा है। इसके जरिए छात्र संगठन के सदस्यों को एक समान पहचान देने की बात सामने आई है।
सपा की मौजूदा राजनीतिक रणनीति में पीडीए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के समीकरण को पार्टी ने पिछले चुनावों में प्रमुख राजनीतिक मुद्दे के तौर पर रखा है। अब अखिलेश यादव ने पीडीए की एक दूसरी व्याख्या सामने रखी है। उन्होंने ‘पीड़ित, दुखी और अपमानित’ लोगों को पीडीए के सकारात्मक समूह के रूप में परिभाषित किया। इसे प्रेम, दया और अपनापन से जोड़ते हुए सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने की बात कही गई। युवाओं को इस नए राजनीतिक फ्रेम से जोड़ने की कोशिश के तहत समानता, सम्मान और भेदभाव से मुक्ति जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नीला रंग लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी और उसके राजनीतिक-सामाजिक आधार से जुड़ा रहा है। बसपा की पहचान में नीले रंग का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे में समाजवादी छात्र सभा के सभी सदस्यों के लिए नीली वर्दी तय किए जाने का राजनीतिक संदर्भ बसपा के प्रभाव वाले सामाजिक आधार से भी जुड़ता है। सपा पहले से पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को अपने राजनीतिक गठजोड़ में जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में नीली वर्दी के जरिए छात्र और युवा संगठन को नई पहचान देने की पहल दलित युवाओं के बीच भी सपा की राजनीतिक पहुंच से जुड़ती है।
सपा की ‘ब्लू ब्रिगेड’
अखिलेश यादव ने यूथ फोर्स को भविष्य की कमान सौंपने के साथ ‘बंधुराष्ट्र’ और ‘नियो इंडिया’ की अवधारणा भी रखी। उन्होंने कहा कि आज का युवा मूल रूप से भेदभाव को नहीं मानता और सभी को ‘बंधु’ यानी मित्र की तरह देखता है। ‘नियो इंडिया’ को बराबरी के आधार पर तैयार होने वाले भारत की अवधारणा से जोड़ा गया है। इसे भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की परंपरा के अनुरूप युवाओं की सोच को वैश्विक स्वरूप देने से जोड़ा गया।
उत्तर प्रदेश में युवा मतदाताओं को लेकर भाजपा, कांग्रेस और सपा की राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से युवाओं के साथ सीधे संवाद और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से जेन-जी के साथ संवाद के बीच अखिलेश यादव ने भी युवाओं के लिए संगठन, पहचान और राजनीतिक विचार का नया फ्रेम सामने रखा है। भाजपा के लिए युवा मतदाता केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा रोजगार और अवसर से जुड़े मुद्दों के जरिए राजनीतिक संपर्क का महत्वपूर्ण आधार हैं। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी के जेन-जी संवाद के जरिए नई पीढ़ी को राजनीतिक बातचीत से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। सपा ने इसके जवाब में अपनी छात्र राजनीति और पीडीए की राजनीति को युवा केंद्रित स्वरूप देने की पहल की है।
उत्तर प्रदेश में युवा मतदाताओं की भूमिका विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों की ओर से इस वर्ग तक पहुंच बनाने के लिए अलग-अलग अभियान और संगठनात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। सपा की ओर से ‘यूथ फोर्स’, नीली वर्दी, पीडीए की नई व्याख्या और ‘नियो इंडिया’ की अवधारणा इसी राजनीतिक तैयारी के साथ सामने रखी गई है। पार्टी की मौजूदा पीडीए राजनीति के साथ इसे जोड़कर युवाओं और छात्रों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है। विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा वोटरों के साथ-साथ दलित युवाओं तक पहुंच बनाने की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।