
लखनऊ. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने भारत संघ (Indian Union) द्वारा दायर उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें भारतीय रेलवे (Indian Railways) को 'लापरवाही और सेवा में कमी' के लिए 40,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। यह मुआवजा उन लोगों को दिया जाना था, जो ट्रेन के छह घंटे के विलंब होने के कारण गंतव्य पर समय से नहीं पहुंच सके थे। कोर्ट ने माना कि भारतीय रेलवे (IR) लंबी दूरी की देरी का अनुमान लगा सकता था और यात्रियों को इसकी सूचना दे सकता था। सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के उस आदेश की पुष्टि की जिसमें जिला फोरम द्वारा दिए गए मुआवजे को बरकरार रखा गया था और रेलवे की ओर से लापरवाही और सेवा में कमी को माना गया था।
जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस रवींद्र भट की एक डिवीजन बेंच ने प्रतिवादियों (यानी, रमेश चंद्र व अन्य) को नोटिस जारी करते हुए फोरम के अधिकार क्षेत्र और भारतीय रेलवे के दायित्व की प्रकृति/सीमा के मुद्दे पर विचार करने पर सहमति जताई है। इस शर्त पर नोटिस जारी किया है कि भारत संघ रेल मंत्रालय के माध्यम से 4 सप्ताह के भीतर कोर्ट की रजिस्ट्री में 25,000 की राशि जमा करवाएगा। बेंच ने आगे स्पष्ट किया कि न्यायालय राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा 'आदेश के निष्पादन पर रोक' नहीं लगा रहा है।
भारतीय रेलवे ने दिया था तर्क-
भारतीय रेलवे ने तर्क दिया कि देरी उनके नियंत्रण से बाहर थी और यह यात्रा के दौरान हुई थी न कि इलाहाबाद स्टेशन पर प्रस्थान करने के समय पर। ट्रेन निर्धारित समय पर चली थी। इसके अलावा, वे भारतीय रेलवे सम्मेलन कोचिंग दर टैरिफ संख्या 26 भाग- I (खंड I) के नियम 115 को प्रकाश में लाए। इसमें कहा गया है कि रेलवे समय सारिणी बुलेटिन में निर्धारित ट्रेनों के निर्धारित आगमन और प्रस्थान की गारंटी नहीं देता है। इसलिए भारतीय रेलवे किसी भी देय क्षति के लिए जिम्मेदार नहीं था।
यह था मामला-
भारतीय रेलवे के खिलाफ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम, इलाहाबाद के समक्ष प्रतिवादियों ने एक शिकायत दर्ज की थी। इसमें ट्रेन के छह घंटे के देरी से चलने के कारण प्रतिवादियों को मानसिक परेशानी, उत्पीड़न, पीड़ा, ससुराल वालों के साथ संबंध खराब हुए थे। इसकी भरपाई के लिए उन लोगों ने 9 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। रेलवे ने दलील दी कि देरी अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण हुई थी, जो उनके नियंत्रण से बाहर थी। हालांकि इस तर्क को खारिज कर दिया और रेलवे को प्रतिवादियों को 40,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया था।