कम बजट में किसानों को बेहतर खेती करने के लिए प्रेरित करने के मकसद से लखनऊ में छह दिवसीय पाठशाला की बुधवार को शुरुआत हो गई।
लखनऊ। कम बजट में किसानों को बेहतर खेती करने के लिए प्रेरित करने के मकसद से लखनऊ में छह दिवसीय पाठशाला की बुधवार को शुरुआत हो गई।कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत में प्रशिक्षण शिविर के मुख्य प्रशिक्षक पद्मश्री सुभाष पालेकर ने कहा कि हरित क्रांति और जैविक खेती से अन्नपूर्णा का दोहन हुआ है। इसके कारण देश लगातार अपनी ऊपजाऊ जमीनों की उर्वरा शक्ति खोता गया। रासायिनक उर्वरकों और कीटनाशक दवाईयों के इस्तेमाल ने मिट्टी में क्षार की अधिकता बढ़ा दी और पानी का स्तर भी लगातार गिरता गया।
पालेकर ने कहा कि दूषित खाद्य सामग्री से संक्रमण का खतरा, खेती से किसानों का पलायन और पर्यावरण प्रदूषण इसी का नतीजा है। उन्होंने कहा कि यदि इन समस्याओं से बचना है तो हमें शून्य लागत प्राकृतिक खेती की तरफ रुख करना होगा। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती के गुर सिखाने के लिए बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में छह दिवसीय शिविर का आयोजन शुरू हो रहा है। इसमें शून्य लागत प्राकृतिक खेती के लिए देशी गाय कृषकों को प्रशिक्षण मिलेगा। इस तरीके का उपयोग कर उत्तर प्रदेश में कई किसान बिना लागत दोगुना लाभ कमा रहे हैं।
पालेकर ने कहा की अभी तक दिल्ली के इंडियन काउंसिल ऑफ रिसर्च इंस्टीट्यूट के पास भी ऐसी कोई पद्धति नहीं है, जिसमें उर्वरकों व रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल न किया जाए। सरकार इस दिशा में नीति बनाने की योजना बना रही है। कृषि मंत्रालय ने इसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय उन्नत कृषि योजना से जोड़ा है। इसमें 100 केंद्रों पर प्राकृतिक पद्धति से खेती के पाठ्यक्रम को शामिल किया है। 20 दिसंबर से शुरू होने जा रहे शिविर में देशभर से लगभग 1500 से अधिक गौपालक शामिल होंगे और प्रशिक्षण लेंगे। प्राकृतिक खेती में हाइब्रिड बीज को देशी बीज में परिवर्तित किया जाएगा। बिजली और पानी का मात्र 10 फीसदी ही इस्तेमाल होगा। पौधे के लिए जरूरी अधिकांश पानी हवा में उपस्थित नमी से पूरा होगा और खेती जहर मुक्त होगी।