
Begum Hamida Habibullah : भारत में क्रिकेट का मतलब कुछ वर्ष पहले तक मेन इन ब्लू (Men In Blue) यानी पुरुष टीम से ही लगाया जाता रहा। हालांकि समय के साथ चीजें धीरे-धीरे बदलती चली गई और अब यह हाल है कि लोग क्रिकेट के बारे में बात चलती है तो यह पूछते हैं कि पुरुष क्रिकेट टीम या महिला क्रिकेट टीम। देश में महिला क्रिकेट टीम के प्रति नजरिया बदलने में बेगम हमीदा हबीबुल्लाह ने नींव में पहला ईंट रखने का काम किया था। आइए जानते हैं कि बेहम हमीदा कौन थीं और उन्होंने क्या किया?
WCAI First President: भारतीय महिला क्रिकेट के इतिहास में यदि किसी दूरदर्शी, समाजसेवी और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत का नाम लिया जाए, तो उसमें बेगम हमीदा हबीबुल्लाह का स्थान सबसे ऊपर रखा जाएगा। उन्होंने ऐसे समय में महिलाओं के लिए खेलों का मार्ग प्रशस्त किया, जब समाज में लड़कियों का खेल के मैदान तक पहुंचना भी असामान्य माना जाता था। वे महिला क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Women's Cricket Association of India) की पहली अध्यक्ष बनीं। WCAI को 1973 में ही इंटरनेशनल वीमेंस क्रिकेट काउंसिल (IWCC) की सदस्यता भी मिल गई।
हमीदा के अथक प्रयासों ने भारत में महिला क्रिकेट को संगठित पहचान दिलाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए अवसरों के द्वार खोले। WCAI को रजिस्टर करने और खड़ा करने का श्रेय मुख्यतः महेंद्र कुमार शर्मा को जाता है, जिन्होंने 1973 में लखनऊ में सोसाइटीज़ एक्ट के तहत WCAI रजिस्टर कराया और स्वयं संस्थापक सचिव बने।
भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अपना पहला टेस्ट मैच 31 अक्टूबर 1976 को खेला। यह मैच वेस्ट इंडीज महिला टीम के खिलाफ बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेला गया था। यह मैच ड्रॉ रहा। इसी श्रृंखला में 19 नवंबर 1976 को पटना में भारत ने वेस्ट इंडीज को हराकर अपने इतिहास की पहली महिला टेस्ट जीत दर्ज की।
बेगम हमीदा हबीबुल्लाह का जन्म 20 नवंबर 1916 को ब्रिटिश भारत के आगरा-अवध संयुक्त प्रांत के लखनऊ में हुआ था। उनके पिता नवाब नज़ीर यार जंग हैदराबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। हमीदा ने बचपन व शुरुआती वर्ष हैदराबाद में बिताए। उनका परिवार शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों के लिए जाना जाता था। बचपन से ही उनमें नेतृत्व क्षमता, सामाजिक चेतना और शिक्षा के प्रति गहरी रुचि थी।
सन् 1938 में उनका विवाह भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी मेजर जनरल इनायत हबीबुल्लाह से हुआ। उनके पति मेजर जनरल इनायत हबीबुल्लाह खड़कवासला स्थित नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) के संस्थापक कमांडेंट थे। विवाह के बाद हामिदा उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में आ गईं। पारिवारिक दायित्व निभाने के साथ-साथ उन्होंने समाज सेवा और महिला शिक्षा के कार्यों को अपना जीवन-ध्येय बना लिया। उनके पुत्र वजाहत हबीबुल्लाह भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त (Chief Information Commissioner) बने।
बेगम हमीदा हबीबुल्लाह का जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक कहानी है। उन्होंने जब अपना सामाजिक जीवन शुरू किया, उस समय महिलाओं की शिक्षा बहुत सीमित थी। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में लड़कियों को विद्यालय भेजना भी परिवारों के लिए कठिन निर्णय माना जाता था। खेलों में महिलाओं की भागीदारी तो लगभग नगण्य थी।
उन्होंने इस सामाजिक सोच को बदलने का संकल्प लिया। उन्होंने समाज को यह समझाया कि शिक्षा और खेल दोनों ही महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं। प्रारंभिक दौर में उन्हें सामाजिक विरोध, रूढ़िवादी मानसिकता और संसाधनों की कमी जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
महिला क्रिकेट को बढ़ावा देना उस समय किसी चुनौती से कम नहीं था। न पर्याप्त मैदान थे, न प्रशिक्षक, न प्रतियोगिताएं और न ही आर्थिक सहायता। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया, प्रतियोगिताओं का आयोजन कराया और महिला क्रिकेट के लिए संस्थागत ढांचा तैयार करने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई।
उनका विश्वास था कि यदि महिलाओं को समान अवसर मिलें तो वे किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं। यही सोच आगे चलकर भारतीय महिला क्रिकेट की मजबूत नींव बनी।
बेगम हमीदा हबीबुल्लाह जब संघ की अध्यक्ष बनीं तब देश में महिला क्रिकेट को लेकर कोई संगठित व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने राज्य स्तर पर महिला क्रिकेट संघों का गठन करवाया, राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की शुरुआत कराई और खिलाड़ियों को बेहतर मंच उपलब्ध कराया।
उनके नेतृत्व में महिला क्रिकेट को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उन्होंने समाज में यह संदेश दिया कि क्रिकेट केवल पुरुषों का खेल नहीं, बल्कि महिलाएँ भी इसमें समान रूप से उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकती हैं। आज भारतीय महिला क्रिकेट जिस ऊंचाई पर पहुंचा है, उसकी नींव रखने वालों में बेगम हमीदा हबीबुल्लाह का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
बेगम हमीदा हबीबुल्लाह केवल खेल तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किए। उन्होंने अपनी सास बेगम इनाम हबीबुल्लाह के साथ मिलकर तालीमगाह-ए-निस्वान नाम स्कूल की स्थापना की। स्कूल की शुरुआत सिर्फ तीन छात्राओं के साथ की गई। कालांतर में यही संस्थान विकसित होकर 3,500 से अधिक छात्राओं को शिक्षा प्रदान करने वाला प्रतिष्ठित विद्यालय बन गया।
वे अनेक शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़ी रहीं तथा लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद की लंबे समय तक सदस्य भी रहीं। उनका मानना था कि शिक्षा ही महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने का सबसे प्रभावी माध्यम है।
बेगम हमीदा हबीबुल्लाह SEWA लखनऊ (Self Employed Women's Association) की अध्यक्ष रहीं। उनके जमाने में सेवा ने करीब 5,000 चिकन कारीगर महिलाओं को रोजगार दिलाने का काम किया था। उन्होंने लखनऊ की प्रसिद्ध चिकनकारी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गरीब एवं जरूरतमंद महिला कारीगरों को रोजगार उपलब्ध कराने में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।
उनके प्रयासों से हजारों महिलाओं को स्वरोजगार मिला और चिकनकारी उद्योग को नई पहचान मिली। वे मानती थीं कि आर्थिक आत्मनिर्भरता ही महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता की कुंजी है।
बेगम हमीदा हबीबुल्लाह ने राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1965 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वे हैदरगढ़ (बाराबंकी) से विधायक चुनी गई थीं। वे एक सफल विधायक, राज्यमंत्री तथा बाद में राज्यसभा सदस्य रहीं। वे 1969 से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की निर्वाचित सदस्य रहीं और 1972-76 तक UPCC महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। वे उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी की संस्थापक अध्यक्ष रहीं। उर्दू अकादमी का उद्घाटन 1972 में हमीदा के हाथों हुआ। वह संस्थापक अध्यक्ष बनीं। बाद में 1972-76 और फिर 1982 में दोबारा पुनर्निर्वाचित हुईं। उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज सेवा का साधन माना। महिला अधिकारों, शिक्षा, ग्रामीण विकास तथा सामाजिक न्याय के मुद्दों को उन्होंने सदैव प्राथमिकता दी।
हमीदा का निधन 13 मार्च 2018 को 101 वर्ष की आयु में लखनऊ में हो गया। आज भारतीय महिला क्रिकेट की अंतरराष्ट्रीय सफलताओं विश्व कप, कॉमनवेल्थ खेलों और महिला आईपीएल जैसी उपलब्धियों की आधारशिला रखने वालों में बेगम हमीदा हबीबुल्लाह का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।