
प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT
Type 1 Diabetes Death Story :"अस्पताल लाने पर वो बेसुध पड़ा था, सांस तेज चल रही थी, उसके शरीर से तेज गंध (फल या नेल पॉलिश जैसी) आ रही थी…" टाइप 1 के इन लक्षणों को डॉ. प्रियम बोरदोलोई ने X पर शेयर किया है। बताया है कि कैसे एक महज 26 साल का युवा इंसुलिन बंद करने के कारण दुनिया से चल बसा। आइए, टाइप 1 डायबिटीज के लक्षण, रिस्क से लेकर तमाम जरूरी बातों को समझते हैं।
डॉ. हिमांशु गुप्ता (सीनियर फिजिशियन, जयपुर) का कहना है कि "टाइप-1 डायबिटीज एक बिल्कुल अलग बीमारी है, जो अक्सर बच्चों और किशोरों में दिखाई देती है और इसमें शरीर इंसुलिन बनाना लगभग बंद कर देता है। ऐसे में बिना इंसुलिन इंजेक्शन के एक दिन भी जीना खुद को जोखिम में डालने की तरह है।"
मेडिकल जर्नल साइट Mayoclinic के अनुसार, टाइप-1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अग्न्याशय (पैंक्रियास) की उन कोशिकाओं पर हमला कर देती है जो इंसुलिन बनाती हैं।
इंसुलिन वह हार्मोन है जो भोजन से मिलने वाली शुगर को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाकर ऊर्जा में बदलने का काम करता है। जब इंसुलिन बनना बंद हो जाता है, तो खून में शुगर बढ़ने लगती है और शरीर ऊर्जा के लिए फैट को जलाना शुरू कर देता है।
इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है। इसे नियमित इंसुलिन, संतुलित खान-पान, व्यायाम और ब्लड शुगर की निगरानी के जरिए नियंत्रित रखा जाता है।
टाइप-1 डायबिटीज को पहले "जुवेनाइल डायबिटीज" भी कहा जाता था क्योंकि इसके अधिकांश मामले बचपन या किशोरावस्था में सामने आते हैं। हालांकि, यह किसी भी उम्र में हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज फेडरेशन (IDF) और T1D Index 2025 के अनुसार, दुनिया में करीब 95 लाख लोग टाइप-1 डायबिटीज के साथ जीवन जी रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चों और किशोरों की है। सिर्फ 2025 में ही लगभग 5.13 लाख नए मामलों का अनुमान है, जिनमें करीब 43 प्रतिशत मरीज 20 वर्ष से कम उम्र के हैं।
भारत की स्थिति और भी चिंताजनक है!
अनुमान है कि देश में करीब 10 लाख लोग टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित हैं। 20 वर्ष से कम उम्र के मरीजों की संख्या के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है। ICMR के अध्ययन के अनुसार, दिल्ली और चेन्नई में हर साल 20 वर्ष से कम उम्र के प्रति एक लाख बच्चों में औसतन 4.9 नए मामले सामने आते हैं।
टाइप-1 डायबिटीज में सबसे बड़ा खतरा सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि उसकी देर से पहचान है।
T1D Index के अनुमान के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में इस बीमारी से करीब 1.74 लाख मौतें हो सकती हैं। इनमें से लगभग 30 हजार मौतें केवल इसलिए होती हैं क्योंकि मरीज की समय पर पहचान नहीं हो पाती।
भारत में स्थिति और गंभीर मानी जाती है। अनुमान है कि हर साल करीब 6 हजार लोगों की मौत सिर्फ इसलिए हो जाती है क्योंकि बीमारी का समय रहते पता नहीं चल पाता। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि शुरुआती लक्षणों को पहचान लिया जाए और समय पर इंसुलिन शुरू हो जाए, तो इनमें से बड़ी संख्या में मौतों को रोका जा सकता है।
टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवनरक्षक दवा है।
डॉ. प्रियम ने अपने पोस्ट में समझाया है, यदि मरीज इंसुलिन लेना बंद कर दे या लगातार डोज छोड़ता रहे, तो शरीर ऊर्जा के लिए फैट जलाने लगता है। इससे कीटोन बनने लगते हैं और डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (DKA) नाम की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
DKA एक मेडिकल इमरजेंसी है। समय पर इलाज न मिलने पर यह बेहोशी, कोमा और यहां तक कि मौत का कारण भी बन सकती है।
इन लक्षणों के दिखते ही तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।
यदि किसी बच्चे में ये संकेत दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
बिल्कुल।
अगर समय पर बीमारी की पहचान हो जाए, नियमित इंसुलिन लिया जाए, ब्लड शुगर की निगरानी की जाए और डॉक्टर की सलाह का पालन किया जाए, तो टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चे पढ़ाई, खेलकूद और अपने करियर सहित लगभग सामान्य जीवन जी सकते हैं।
नोट: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी लक्षण, जांच या इलाज के लिए योग्य चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।
Updated on:
17 Jul 2026 05:55 pm
Published on:
17 Jul 2026 05:54 pm
