
बरसात का मौसम हमारे लिए सुहाना हो सकता है पर आपके बच्चे के लिए नहीं। बतौर माता-पिता आपको मानसून में अधिक अलर्ट रहना चाहिए। आइए, ICMR (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) और MoRTH (सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय) के आधिकारिक आंकड़ों के साथ इस बात की गंभीरता को समझते हैं और जानते हैं कि कैसे आप अपने बच्चे का ख्याल रख सकते हैं।
मानसून आते ही बच्चों के सामने खतरों की एक पूरी चेन खड़ी हो जाती है, जिसे चार प्रमुख हिस्सों में समझा जा सकता है:
बरसात के दिनों में हवा में नमी का स्तर 80-90% तक पहुंच जाता है, जो वायरस और बैक्टीरिया के पनपने के लिए 'सुपर-कंडक्टिव' माहौल है।
दूषित पानी और डायरिया का खतरा
Indian Council of Medical Research (ICMR) की रिपोर्ट और नेशनल हॉस्पिटल बेस्ड सर्विलांस के अनुसार, भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण रोटावायरस और दूषित पानी से होने वाला डायरिया (दस्त) है। मानसून के महीनों (जून से सितंबर) में बच्चों में पेट के संक्रमण और गैस्ट्रोएंटेराइटिस के मामलों में 40% से 50% तक की भारी उछाल देखी जाती है।
विशेषज्ञ की राय: पीडियाट्रिशियन बताते हैं, "मानसून में पाइपलाइनों में सीवेज का पानी मिक्स होने का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों की आंतें ई-कोलाई (E. coli) और साल्मोनेला बैक्टीरिया के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं, जिससे मामूली सी लापरवाही भी गंभीर डिहाइड्रेशन का कारण बन जाती है।"
मच्छर-जनित रोग: डेंगू और मलेरिया का प्रहार
National Center for Vector Borne Disease Control (NCVBDC) के आंकड़ों के मुताबिक, मानसून के दौरान और उसके ठीक बाद भारत में डेंगू और चिकनगुनिया के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी होती है।
बच्चों का खेल का मैदान अक्सर खुली जगहें होती हैं। एडीज (Aedes) मच्छर जो दिन में काटता है, बच्चों के पैरों और हाथों को आसानी से निशाना बनाता है। बच्चों में डेंगू होने पर प्लेटलेट्स गिरने की गति वयस्कों से तेज होती है, जिससे स्थिति जल्दी क्रिटिकल हो जाती है।
मानसून में खतरा सिर्फ घर के अंदर अदृश्य कीटाणुओं से नहीं है, बल्कि घर से बाहर निकलते ही सड़कों पर फैले गड्ढों से भी है।
गड्ढों (Potholes) के कारण हादसे
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हर साल गड्ढों के कारण औसतन 3,000 से अधिक लोग अपनी जान गवाते हैं और 10,000 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं। मानसून के दौरान इन हादसों का ग्राफ 30% तक बढ़ जाता है।
जब सड़कों पर जलभराव (Waterlogging) होता है, तो गहरे गड्ढे या खुले मैनहोल पानी के नीचे छिप जाते हैं। स्कूल वैन, ऑटो, या माता-पिता के साथ टू-व्हीलर पर जा रहे बच्चे इन झटकों के कारण सीधे सड़क पर गिर जाते हैं। बच्चों की हड्डियां नाजुक होने के कारण उन्हें फ्रैक्चर और हेड इंजरी (सिर की चोट) का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
बिजली के खंभे और करंट (Electrocution)
मानसून में जलभराव के दौरान सड़कों पर लगे बिजली के खंभों या जमीन पर गिरे तारों से पानी में करंट उतरने की घटनाएं आम हो जाती हैं। बच्चे स्वभाव से खोजी (Curious) होते हैं और अक्सर पानी के गड्ढों में कूदते हैं, जिससे वे करंट की चपेट में आ जाते हैं।
मानसून में जलभराव के कारण जमीन के नीचे रहने वाले जीव, खासकर सांप, अपने बिलों से बाहर निकलकर सूखी और ऊंची जगहों की तलाश में इंसानी बस्तियों, घरों के कोनों, बगीचों और स्कूलों के मैदानों तक पहुंच जाते हैं।
चौंकाने वाले आंकड़े
World Health Organization (WHO) की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में सांप काटने से होने वाली मौतों में सबसे बड़ी संख्या भारत की है, जहां हर साल लगभग 58,000 मौतें होती हैं। इनमें से 70% से अधिक मामले मानसून के महीनों (जून से सितंबर) में दर्ज किए जाते हैं।
बच्चे अक्सर घास-फूस वाले मैदानों में खेलने जाते हैं या अंधेरे कोनों में पड़ी चीजों को बिना देखे उठा लेते हैं। वयस्कों की तुलना में बच्चों का शरीर छोटा होता है, जिससे सांप का जहर (Venom) उनके शरीर में बहुत तेजी से फैलता है, जो चंद घंटों में जानलेवा साबित हो सकता है।
विशेषज्ञ की राय: डॉक्टरों का कहना है कि मानसून में बच्चों को कभी भी नंगे पैर घास या झाड़ियों में न जाने दें। सांप के काटने पर किसी भी झाड़-फूंक के बजाय बिना समय गंवाए तुरंत एंटी-स्नेक वेनम (ASV) वाले नजदीकी सरकारी अस्पताल ले जाना ही एकमात्र इलाज है।
आंकड़ों की गंभीरता को देखते हुए, माता-पिता को मानसून के चार महीनों में इन 4 स्टेप्स का सख्त पालन करना चाहिए:
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