
First Hydrogen Train | हाइड्रोजन ट्रेन की तस्वीर | Credit- भारतीय रेलवे
First Hydrogen Train; भारतीय रेलवे का नया युग: भारतीय रेलवे के 170 साल से भी अधिक पुराने इतिहास में 17 जुलाई की तारीख एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रही है। अगर आप रोजमर्रा के सफर में लोकल या पैसेंजर ट्रेनों के शोर, भारी झटकों और डीजल के धुएं से परेशान हो चुके हैं, तो अब एक बहुत बड़े और सुखद बदलाव के लिए तैयार हो जाइए।
देश की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन पावर्ड (Hydrogen-powered) पैसेंजर ट्रेन पटरियों पर दौड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।
हाल ही में रेल मंत्रालय ने इसके सभी कड़े ट्रायल पूरे कर लिए हैं। आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह आधुनिक ट्रेन 17 जुलाई को हरियाणा के जींद से सोनीपत रूट पर अपनी पहली कमर्शियल यात्रा शुरू करेगी।
यह सिर्फ एक नई ट्रेन की शुरुआत नहीं है, बल्कि 'जीरो एमिशन' (शून्य प्रदूषण) और हरित ऊर्जा की ओर भारत का अब तक का सबसे साहसिक कदम है। आइए विस्तार से जानते हैं इसके रूट, किराये, समय-सारणी, खास सुविधाओं और इस तकनीक के बारे में जो इसे बाकी सभी ट्रेनों से बिल्कुल अलग बनाती है।
रेलवे बोर्ड ने उत्तर रेलवे (Northern Railway) के दिल्ली डिवीजन को इस ऐतिहासिक शुरुआत के लिए पूरी तरह से तैयार रहने का निर्देश दिया है। यह हाइड्रोजन ट्रेन जींद और सोनीपत के बीच लगभग 89 से 90 किलोमीटर का सफर तय करेगी।
अक्सर देखा गया है कि जब भी कोई नई और हाई-टेक ट्रांसपोर्ट सेवा शुरू होती है, तो उसका किराया आम आदमी की पहुंच से बाहर होता है। लेकिन रेलवे ने इस हाइड्रोजन ट्रेन को एक अलग विजन के साथ पेश किया है। इस शानदार सफर के लिए यात्रियों को अपनी जेब ज्यादा ढीली नहीं करनी पड़ेगी।
इस रूट पर टिकट की कीमत मात्र 5 रुपये से लेकर 25 रुपये के बीच रखी जाने की संभावना है। यात्री क्षमता की बात करें तो, 10 डिब्बों (कोच) वाली इस विशाल ट्रेन में एक बार में लगभग 2,500 यात्री आराम से सफर कर सकेंगे। लोकल कम्यूटर यात्रा के लिए अधिकतम 75 किलोमीटर प्रति घंटे (kmph) की रफ्तार से चलने वाली यह ट्रेन भविष्य के पब्लिक ट्रांसपोर्ट का एक बेहतरीन मॉडल है।
यह ट्रेन विदेशी तकनीक का आयात नहीं है, बल्कि पूरी तरह से 'मेक इन इंडिया' का शानदार उदाहरण है। इसे चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है।
वर्तमान में, यह ब्रॉड गेज प्लेटफॉर्म पर दुनिया की सबसे लंबी (10 कोच) और सबसे शक्तिशाली (2400 किलोवॉट) हाइड्रोजन ट्रेन-सेट है। इस ट्रेन में 1200 kW के दो ड्राइविंग पावर कार (DPC) लगे हैं जो पूरी ट्रेन को ऊर्जा देते हैं, और साथ में 8 अत्याधुनिक पैसेंजर कोच हैं।
प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने इस पायलट प्रोजेक्ट को भारतीय रेलवे के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और "हरित और अधिक ऊर्जा-कुशल रेल संचालन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम" करार दिया है।
रेलवे बोर्ड ने यह सुनिश्चित किया है कि सुरक्षा में कोई चूक न हो। इसके लिए पिछले महीने ट्रेन के अंतिम ट्रायल किए गए, जिसमें इमरजेंसी ब्रेकिंग डिस्टेंस और तेज गति पर कंपन (Oscillation tests) का कड़ाई से मूल्यांकन किया गया। अधिकारियों ने बताया कि इस हाई-टेक ट्रेनसेट का नियमित रखरखाव (Maintenance) दिल्ली के शकूरबस्ती डिपो में किया जाएगा, जिसके लिए वहां खास तैयारियां और ऑथराइजेशन पूरी कर ली गई हैं।
आम ट्रेनों में डीजल जलने से हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है जो पर्यावरण और हमारी सेहत को नुकसान पहुंचाती है। लेकिन इस हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल सेल के अंदर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का रासायनिक रिएक्शन होता है, जिससे बिजली बनती है। इस पूरी प्रक्रिया का बाय-प्रोडक्ट (उत्सर्जन) केवल हल्की गर्मी और पानी की भाप होती है। यानी यह 100% इको-फ्रेंडली है। इसके अलावा, डीजल इंजन के मुकाबले इसमें कोई शोर या कंपन नहीं होता, जिससे आपका सफर एकदम शांत और आरामदायक रहता है।
17 जुलाई को इस ट्रेन के उद्घाटन के साथ ही भारत एक बहुत बड़ी छलांग लगाएगा। अब तक केवल जर्मनी, स्वीडन, जापान और चीन जैसे गिने-चुने विकसित देशों के पास ही कमर्शियल हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की क्षमता थी। अब भारत भी इस वैश्विक 'एलीट क्लब' का हिस्सा बन गया है।
अगर हरियाणा में चल रहा यह पायलट प्रोजेक्ट पूरी तरह से सफल साबित होता है, तो भविष्य में देश के उन तमाम रूटों पर यह तकनीक लागू की जाएगी जहां अभी तक विद्युतीकरण (Electrification) नहीं हो पाया है। कुल मिलाकर, यह ट्रेन केवल लोहे और फाइबर से बना एक वाहन नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर और प्रदूषण-मुक्त भारत के भविष्य की एक खूबसूरत तस्वीर है। 17 जुलाई का दिन रेलवे प्रेमियों और पर्यावरण के प्रति जागरूक यात्रियों के लिए एक बड़े उत्सव से कम नहीं होगा।
Updated on:
11 Jul 2026 02:28 pm
Published on:
11 Jul 2026 02:28 pm
