
Censorship in India : फिल्म सतलुज का पहले भारत, फिर दुनिया भर से हट जाना और दिलजीत दोसांझ का सत्ता के सामने तनकर खड़ा हो जाना, यही लोकतंत्र की असली तस्वीर है। एक तरफ सेंसरशिप है तो दूसरी ओर एक लोकतांत्रिक देश का कलाकार। पर, जहां भारतीय सिनेमा में 50 हजार से अधिक एक्टिव एक्टर्स हैं, वहां ऐसे कितने दिलजीत हैं?
शायद आप भी मेरी तरह प्रकाश राज, तापसी पन्नू, अनुराग कश्यप जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही उंगलियों पर गिना पाएंगे।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट आया है, तब कला की दुनिया से प्रतिरोध की आवाजें उठी हैं। लेकिन समकालीन दौर में जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री पर एक अघोषित सन्नाटा पसरा हुआ है, तब कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया है।
यह कोई फिल्मी पटकथा नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक और लोकतांत्रिक संघर्ष की वह इनसाइड स्टोरी है, जहां सवाल पूछने और ऐतिहासिक सच दिखाने की कीमत इन सितारों को उठानी पड़ रही है - और खास बात यह है कि इनमें से कुछ कलाकारों ने खुद खुलकर कहा है कि यही उनके बोलने की कीमत है।
हर मामले में सरकारी एजेंसियों ने आधिकारिक तौर पर टैक्स चोरी, आर्थिक गड़बड़ी या सर्टिफिकेशन जैसी वजहें बताई हैं - किसी ने भी लिखित रूप में यह स्वीकार नहीं किया कि कार्रवाई राजनीतिक बयानों की वजह से हुई। लेकिन विपक्षी नेताओं, मानवाधिकार संगठनों और खुद कुछ कलाकारों ने इस समय और तरीके पर सवाल उठाए हैं - यही इस पूरी बहस की जड़ है।
इन मामलों को देखकर यह काफी हद तक समझ आता है कि क्यों आलोचकों को लगता है कि सत्ता बुलंद आवाजों को दबाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे आजमाती है। सत्ता के आलोचकों के मुताबिक, सिनेमा की लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने के लिए इन चार तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है:
इन गिने-चुने बागी कलाकारों में से भी सिर्फ दो नाम ऐसे हैं, जो एक बार नहीं बल्कि बार-बार सत्ता से टकराने की जुर्रत करते हैं। आइए, प्रकाश राज और दिलजीत दोसांझ के सत्ता के सीधे निशाने पर आने की कहानी को विस्तार से समझते हैं:
प्रकाश राज का विरोध पूरी तरह वैचारिक है। साल 2017 में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद शुरू हुआ उनका #JustAsking अभियान आज एक बड़े राजनैतिक प्रतिरोध का रूप ले चुका है। वे किसी एक नीति का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सत्ता की विचारधारा और उसके शीर्ष नेतृत्व का विरोध करते हैं।
प्रकाश राज ने खुद इस "कीमत" को कभी नकारा नहीं। जुलाई 2026 में ThePrint से बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि सत्ता जहां आपकी कमजोरी देखती है, वहीं वार करती है, और उन्हें पता था कि उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी - फिर भी वे इससे सहज हैं। उनका कहना है कि लोग सिर्फ उनकी कीमत की बात करते हैं, यह नहीं देखते कि इस रास्ते ने उनकी ज़िंदगी को कितना अर्थपूर्ण बना दिया है।
दिलजीत दोसांझ का रास्ता प्रकाश राज से अलग है। वे खुद को बार-बार "कलाकार हूं, राजनेता नहीं" कहकर सक्रिय राजनीति से दूर रखते हैं। लेकिन जब बात पंजाब की अस्मिता, किसानों के अधिकार या उनकी कला की आती है, तो वे सीधे सिस्टम से टकरा जाते हैं। साल 2020 में किसान आंदोलन का खुलकर समर्थन करना कहीं न कहीं सत्ता को नागवार गुजरा था।
यदि सत्ता अपनी सहूलियत के हिसाब से समाज के आईने को धुंधला करने, उस पर कट्स लगाने या उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से गायब करने की कोशिश करेगी, तो नुकसान सिर्फ कला का नहीं होगा।
प्रकाश राज के तीखे सवाल और दिलजीत दोसांझ का खुलकर बोलना इस बात की गवाही देते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अभी भी सच कहने का साहस पूरी तरह दफ्न नहीं हुआ है। और जब खुद प्रकाश राज कहते हैं कि उन्हें अपनी कमजोरी और उसकी कीमत, दोनों का पता था - तो यह सिर्फ एक आरोप नहीं, बल्कि उस कीमत की एक स्वीकारोक्ति है, जो कला की आज़ादी के लिए चुकाई जा रही है।
नोट: इस स्टोरी में बताई गई हर सरकारी कार्रवाई (IT रेड, ED समन, CBFC के कट्स) की आधिकारिक वजह अलग बताई गई हैं। इन कार्रवाइयों और कलाकारों के राजनैतिक बयानों के बीच सीधा संबंध होना अब तक आधिकारिक रूप से साबित नहीं हुआ है; यह विपक्ष, अधिकार संगठनों और कुछ कलाकारों का आरोप/अनुभव है, जबकि सत्तापक्ष हर बार इससे इनकार करता रहा है।