Magazine

सिनेमा और सेंसर के बीच क्यों पीस रही सरकार? प्रकाश राज और दिलजीत दोसांझ जैसे मामलों से समझिए

Censorship in India : बॉलीवुड के सन्नाटे के बीच प्रकाश राज और दिलजीत दोसांझ जैसे कलाकार सत्ता से क्यों टकरा रहे हैं? जानिए सतलुज फिल्म बैन से लेकर ED-IT रेड की पूरी इनसाइड स्टोरी।
6 min read
Jul 14, 2026
Censorship in India, film banned, Fighter actors, Diljit Dosanjh,
Censorship in India | दिलजीत दोसांझ व प्रकाश राज की फाइल फोटो | Credit- Gemini AI and Patrika

Censorship in India : फिल्म सतलुज का पहले भारत, फिर दुनिया भर से हट जाना और दिलजीत दोसांझ का सत्ता के सामने तनकर खड़ा हो जाना, यही लोकतंत्र की असली तस्वीर है। एक तरफ सेंसरशिप है तो दूसरी ओर एक लोकतांत्रिक देश का कलाकार। पर, जहां भारतीय सिनेमा में 50 हजार से अधिक एक्टिव एक्टर्स हैं, वहां ऐसे कितने दिलजीत हैं?

शायद आप भी मेरी तरह प्रकाश राज, तापसी पन्नू, अनुराग कश्यप जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही उंगलियों पर गिना पाएंगे।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट आया है, तब कला की दुनिया से प्रतिरोध की आवाजें उठी हैं। लेकिन समकालीन दौर में जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री पर एक अघोषित सन्नाटा पसरा हुआ है, तब कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया है।

यह कोई फिल्मी पटकथा नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक और लोकतांत्रिक संघर्ष की वह इनसाइड स्टोरी है, जहां सवाल पूछने और ऐतिहासिक सच दिखाने की कीमत इन सितारों को उठानी पड़ रही है - और खास बात यह है कि इनमें से कुछ कलाकारों ने खुद खुलकर कहा है कि यही उनके बोलने की कीमत है।

📊 क्विक टाइमलाइन: सत्ता के निशाने पर आए सितारों की लिस्ट

हर मामले में सरकारी एजेंसियों ने आधिकारिक तौर पर टैक्स चोरी, आर्थिक गड़बड़ी या सर्टिफिकेशन जैसी वजहें बताई हैं - किसी ने भी लिखित रूप में यह स्वीकार नहीं किया कि कार्रवाई राजनीतिक बयानों की वजह से हुई। लेकिन विपक्षी नेताओं, मानवाधिकार संगठनों और खुद कुछ कलाकारों ने इस समय और तरीके पर सवाल उठाए हैं - यही इस पूरी बहस की जड़ है।

इन मामलों को देखकर यह काफी हद तक समझ आता है कि क्यों आलोचकों को लगता है कि सत्ता बुलंद आवाजों को दबाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे आजमाती है। सत्ता के आलोचकों के मुताबिक, सिनेमा की लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने के लिए इन चार तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है:

  • सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग (राजनीतिक आईटी सेल): जब भी कोई कलाकार बोलता है, तो राजनीतिक दलों की आईटी सेल उन्हें जमकर ट्रोल करती है ताकि वे मानसिक दबाव में आ जाएं।
  • सेंसरशिप का नया हथियार: अब सरकारें सिर्फ थियेटरों में फिल्में बैन नहीं करतीं। फिल्म सतलुज का उदाहरण दिखाता है कि अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (OTT) पर भी सेंसरशिप की परछाई पहुंच चुकी है। इतिहास के उन पन्नों पर सवाल उठ रहे हैं जो व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हैं।
  • भीड़तंत्र (Mobocracy) को मूक सहमति: प्रकाश राज की फिल्मों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले संगठनों पर सख्त कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि असहमति जताने वाले कलाकारों को सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए भीड़ को खुली छूट मिली हुई है।
  • डर का साम्राज्य: 50,000 से अधिक वर्किंग आर्टिस्ट्स वाली इस विशाल भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में सिर्फ गिने-चुने नाम ही खुलकर क्यों बोल रहे हैं? आलोचकों के मुताबिक, बाकी कलाकारों की रीढ़ को व्यावसायिक नुकसान और टैक्स एजेंसियों के डर ने तोड़ दिया है। हालांकि सरकार समर्थक इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं और हर कार्रवाई को नियमों के दायरे में बताते हैं।

इन गिने-चुने बागी कलाकारों में से भी सिर्फ दो नाम ऐसे हैं, जो एक बार नहीं बल्कि बार-बार सत्ता से टकराने की जुर्रत करते हैं। आइए, प्रकाश राज और दिलजीत दोसांझ के सत्ता के सीधे निशाने पर आने की कहानी को विस्तार से समझते हैं:

प्रकाश राज: 'जस्ट आस्किंग' से लेकर "मुझे कीमत पता थी" तक का सच

प्रकाश राज का विरोध पूरी तरह वैचारिक है। साल 2017 में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद शुरू हुआ उनका #JustAsking अभियान आज एक बड़े राजनैतिक प्रतिरोध का रूप ले चुका है। वे किसी एक नीति का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सत्ता की विचारधारा और उसके शीर्ष नेतृत्व का विरोध करते हैं।

प्रकाश राज ऐसे चुका रहे हैं कीमत — और खुद मानते हैं:

  • फिल्मों से अघोषित निष्कासन: प्रकाश राज खुद 2019 में स्वीकार कर चुके हैं कि अक्टूबर 2017 में मुखर होने के बाद से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से उन्हें कोई ऑफर नहीं मिला, जबकि दक्षिण भारतीय सिनेमा में उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।
  • सेंसरशिप पर तीखा हमला: जनवरी 2026 में बेंगलुरु इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (BIFFes) के उद्घाटन पर, जहां वे इस साल के ब्रांड एंबेसडर भी हैं, प्रकाश राज ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार कई फिलिस्तीनी फिल्मों को स्क्रीनिंग की मंजूरी नहीं दे रही। उन्होंने कर्नाटक सरकार से इसके खिलाफ खुलकर स्टैंड लेने की मांग की और कहा कि सिनेमा को राजनीतिक एजेंडे से बाधित नहीं होना चाहिए।
  • इंडस्ट्री की रीढ़ पर सवाल: प्रकाश राज अक्सर बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय सिनेमा के बड़े सितारों की चुप्पी को आड़े हाथों लेते रहे हैं। उनके बेबाक अंदाज के कारण कर्नाटक में कई संगठनों ने उनकी फिल्मों के खिलाफ प्रदर्शन किए और उन पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठाई।
  • ईडी (ED) की एंट्री: नवंबर 2023 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने त्रिची की एक ज्वेलरी चेन (पूर्णव ज्वेलर्स) से जुड़े कथित ₹100 करोड़ के पोंजी स्कीम मामले में प्रकाश राज को पूछताछ के लिए समन जारी किया। वे उस कंपनी के केवल ब्रांड एंबेसडर रहे थे। ED ने इसे विशुद्ध आर्थिक अपराध की जांच बताया, जबकि कुछ आलोचकों ने सवाल उठाया कि उनके तीखे राजनैतिक बयानों के कारण ही उनका नाम इस केस में सामने आया।

प्रकाश राज ने खुद इस "कीमत" को कभी नकारा नहीं। जुलाई 2026 में ThePrint से बातचीत में उन्होंने साफ कहा कि सत्ता जहां आपकी कमजोरी देखती है, वहीं वार करती है, और उन्हें पता था कि उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी - फिर भी वे इससे सहज हैं। उनका कहना है कि लोग सिर्फ उनकी कीमत की बात करते हैं, यह नहीं देखते कि इस रास्ते ने उनकी ज़िंदगी को कितना अर्थपूर्ण बना दिया है।

दिलजीत दोसांझ: किसान आंदोलन से 'सतलुज' के हटने तक की इनसाइड स्टोरी

दिलजीत दोसांझ का रास्ता प्रकाश राज से अलग है। वे खुद को बार-बार "कलाकार हूं, राजनेता नहीं" कहकर सक्रिय राजनीति से दूर रखते हैं। लेकिन जब बात पंजाब की अस्मिता, किसानों के अधिकार या उनकी कला की आती है, तो वे सीधे सिस्टम से टकरा जाते हैं। साल 2020 में किसान आंदोलन का खुलकर समर्थन करना कहीं न कहीं सत्ता को नागवार गुजरा था।

दिलजीत दोसांझ ऐसे चुका रहे हैं कीमत:

  • फिल्म 'सतलुज' का लंबा सफर: मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा (जिन्होंने 90 के दशक में पंजाब में पुलिस द्वारा किए गए कथित अवैध दाह-संस्कार और एनकाउंटर के सच को उजागर किया था, और बाद में जिनका खुद अपहरण कर हत्या कर दी गई) के जीवन पर बनी यह फिल्म पहले 'घल्लूघारा' और फिर 'पंजाब 95' नाम से बन रही थी। 2022 में सेंसर बोर्ड (CBFC) के पास जमा होने के बाद इसे तीन साल तक सर्टिफिकेशन की लड़ाई झेलनी पड़ी - शुरुआत में 21 कट्स से बात शुरू हुई, जो आगे बढ़कर अलग-अलग रिपोर्टों में 85 से लेकर 127 तक जा पहुंची। थक कर मेकर्स ने फिल्म को थियेटर में रिलीज़ ही नहीं किया।
  • बिना शोर के OTT रिलीज़: आखिरकार 3 जुलाई 2026 को यह फिल्म नए नाम 'सतलुज' से बिना किसी प्रोमोशन के ZEE5 पर पूरी दुनिया में बिना कट्स के रिलीज़ हुई। दिलजीत ने बाद में बताया कि उन्हें पहले से आशंका थी कि फिल्म बैन हो सकती है, इसीलिए जानबूझकर प्रचार नहीं किया गया।
  • 48 घंटे में गायब: रिलीज़ के करीब दो दिन बाद, 5 जुलाई की शाम को ZEE5 ने फिल्म को भारत के अपने ऐप से हटा दिया (हालांकि यह ZEE5 ग्लोबल पर बाहर के देशों में उपलब्ध रही)। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है - ZEE5 ने हटाने की वजह के तौर पर सिर्फ "current developments" (मौजूदा घटनाक्रम) कहा; न तो प्लेटफॉर्म और न ही सरकार ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया कि यह सीधे केंद्र सरकार के निर्देश पर हुआ।
  • दिलजीत का पलटवार: फिल्म हटने के अगली सुबह दिलजीत ने इंस्टाग्राम लाइव पर आकर पंजाबी में कहा कि उन्हें पहले से अंदेशा था कि यह होगा, बस इतनी जल्दी होने की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने फैंस से कहा कि जो चीज़ एक बार इंटरनेट पर आ जाए, वह कभी पूरी तरह मिटती नहीं, और जिन्होंने फिल्म डाउनलोड कर ली है वे इसे आगे शेयर करें। उन्होंने यह भी कहा कि 1995 से 2026 तक जैसे हम वहीं खड़े हैं जहां थे - इंसानियत मर चुकी है, इसी बात का दुख है।

साहस पूरी तरह दफ्न नहीं हुआ...

यदि सत्ता अपनी सहूलियत के हिसाब से समाज के आईने को धुंधला करने, उस पर कट्स लगाने या उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से गायब करने की कोशिश करेगी, तो नुकसान सिर्फ कला का नहीं होगा।

प्रकाश राज के तीखे सवाल और दिलजीत दोसांझ का खुलकर बोलना इस बात की गवाही देते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अभी भी सच कहने का साहस पूरी तरह दफ्न नहीं हुआ है। और जब खुद प्रकाश राज कहते हैं कि उन्हें अपनी कमजोरी और उसकी कीमत, दोनों का पता था - तो यह सिर्फ एक आरोप नहीं, बल्कि उस कीमत की एक स्वीकारोक्ति है, जो कला की आज़ादी के लिए चुकाई जा रही है।

नोट: इस स्टोरी में बताई गई हर सरकारी कार्रवाई (IT रेड, ED समन, CBFC के कट्स) की आधिकारिक वजह अलग बताई गई हैं। इन कार्रवाइयों और कलाकारों के राजनैतिक बयानों के बीच सीधा संबंध होना अब तक आधिकारिक रूप से साबित नहीं हुआ है; यह विपक्ष, अधिकार संगठनों और कुछ कलाकारों का आरोप/अनुभव है, जबकि सत्तापक्ष हर बार इससे इनकार करता रहा है।

Updated on:
14 Jul 2026 03:59 pm
Published on:
14 Jul 2026 03:06 pm