
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अपनी मांग को लेकर जंतर-मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं। (Photo: IANS)
Sonam Wangchuk News : शिक्षा सुधारक, पर्यावरणविद और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक बीते कई दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन (Sonam Wangchuk Hunger Strike) पर बैठे हैं। उनका यह अनशन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के समर्थन में है। सीजेपी, नीट (NEET) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कराने, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) के इस्तीफे की मांग भी कर रही है। अनशन के चलते सोनम वांगचुक की सेहत लगातार बिगड़ रही है।
चिकित्सकों के अनुसार उनका वजन कई किलो कम हो चुका है। रक्तचाप और ब्लड शुगर का स्तर भी गिरा है, जिससे समर्थकों और विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक संगठनों में चिंता बढ़ गई है। कई सार्वजनिक हस्तियों और नेताओं ने उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताते हुए सरकार से संवाद का रास्ता निकालने की अपील की है।
इंजीनियर, शिक्षाविद, पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आज केवल लद्दाख ही नहीं, बल्कि पूरे देश में एक चर्चित नाम हैं। आम लोग उन्हें फिल्म '3 इडियट्स' के किरदार 'फुंसुख वांगड़ू' की प्रेरणा के रूप में जानते हैं, लेकिन उनकी वास्तविक पहचान उससे कहीं बड़ी है। शिक्षा सुधार, जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और लद्दाख के सतत विकास के लिए दशकों से काम कर रहे वांगचुक पिछले कुछ वर्षों से केंद्र सरकार के खिलाफ अपने आंदोलन को लेकर भी लगातार चर्चा में हैं। उन्हें अपने उद्देश्यों की लड़ाई के लिए जेल भी जाना पड़ा। सोनम की मांग है कि लद्दाख की संस्कृति, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई दिनों से अनशन पर बैठे हैं। उनका स्वास्थ्य भी लगातार बिगड़ रहा है।
1 सितंबर 1966 को लद्दाख के अलची गांव में जन्मे सोनम वांगचुक की शुरुआती पढ़ाई आसान नहीं रही। उनके गांव में स्कूल नहीं था, इसलिए शुरुआती शिक्षा उन्होंने अपनी मां से मातृभाषा में प्राप्त की। बाद में श्रीनगर और फिर इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान उन्होंने महसूस किया कि पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था लद्दाख जैसे दूरदराज क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। इसी सोच ने उन्हें शिक्षा सुधार की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया।
1988 में उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य ऐसी शिक्षा देना था, जो स्थानीय परिस्थितियों, भाषा और रोजगार से जुड़ी हो। SECMOL ने हजारों छात्रों को वैकल्पिक शिक्षा, व्यावहारिक प्रशिक्षण और नेतृत्व कौशल प्रदान किए। इसके बाद शुरू हुआ ऑपरेशन न्यू होप, जिसने सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वांगचुक का सबसे चर्चित नवाचार आइस स्तूपा है। यह कृत्रिम ग्लेशियर तकनीक सर्दियों में पानी को जमा करके गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलने देती है, जिससे खेती और पेयजल की समस्या कम होती है। जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हिमालयी क्षेत्रों के लिए यह तकनीक एक वैश्विक मॉडल मानी जाती है।
उन्होंने अत्यधिक ठंड वाले क्षेत्रों के लिए सोलर-हीटेड भवन, सोलर टेंट और कम ऊर्जा खर्च करने वाली तकनीकों का विकास किया। इन नवाचारों का उपयोग स्थानीय लोगों के साथ-साथ ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बलों के लिए भी उपयोगी साबित हुआ।
वांगचुक ने हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (HIAL) की स्थापना की। इसका उद्देश्य ऐसा उच्च शिक्षा मॉडल विकसित करना है जो हिमालयी क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप हो और स्थानीय युवाओं को पलायन के बजाय अपने क्षेत्र में रोजगार एवं नवाचार के अवसर उपलब्ध कराए।
शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सोनम वांगचुक को रैमोन मैग्सेसे पुरस्कार (2018) सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। उनकी पहचान एक ऐसे नवप्रवर्तक के रूप में बनी जिसने विज्ञान और स्थानीय ज्ञान को जोड़कर विकास का नया मॉडल प्रस्तुत किया।
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। शुरुआत में इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ, लेकिन जल्द ही स्थानीय संगठनों ने महसूस किया कि विधानसभा न होने और संवैधानिक सुरक्षा के अभाव में जमीन, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी दबाव बढ़ सकता है। इसी मुद्दे पर सोनम वांगचुक ने आंदोलन का नेतृत्व शुरू किया।
मार्च 2024 में सोनम वांगचुक ने 21 दिन का 'क्लाइमेट फास्ट' शुरू किया। उनका कहना था कि यह केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि हिमालय और उसके पर्यावरण को बचाने का अभियान है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा नहीं की गई तो इसका असर पूरे उत्तर भारत की जल सुरक्षा पर पड़ेगा। इसके बाद उन्होंने लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च का भी प्रयास किया। दिल्ली सीमा पर उन्हें और उनके समर्थकों को पुलिस ने हिरासत में लिया, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
केंद्र सरकार का कहना रहा है कि लद्दाख के विकास और स्थानीय हितों की रक्षा के लिए लगातार बातचीत की जा रही है। गृह मंत्रालय और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की वार्ता हुई है। हाल के समय में प्रशासन ने लद्दाख के सभी सात जिलों में स्वायत्त हिल काउंसिल स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाने की घोषणा भी की है, जिसे स्थानीय शासन को मजबूत करने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, वांगचुक और कई स्थानीय संगठन अब भी मानते हैं कि उनकी मूल संवैधानिक मांगें पूरी तरह पूरी नहीं हुई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह आंदोलन केवल लद्दाख की राजनीति तक सीमित नहीं है। यह विकास बनाम पर्यावरण, स्थानीय अधिकार बनाम केंद्रीकृत शासन और जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े सवालों से जुड़ा है। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति, तेजी से पिघलते ग्लेशियर और सामरिक महत्व को देखते हुए यहां की नीतियां राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण - दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
फिलहाल जंतर-मंतर पर जारी सोनम वांगचुक का अनशन केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि सरकार और आंदोलनों के बीच संवाद की परीक्षा भी बन गया है। एक ओर समर्थकों का कहना है कि उनकी मांगें लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी हैं, वहीं सरकार पर बातचीत तेज करने का दबाव बढ़ रहा है। लगातार गिरती स्वास्थ्य स्थिति के बीच अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या केंद्र सरकार कोई ठोस पहल करती है या यह आंदोलन और लंबा खिंचता है।
Updated on:
14 Jul 2026 01:14 pm
Published on:
14 Jul 2026 01:14 pm
