14 जुलाई 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Monsoon Skin Care: मानसून में एलर्जी, रैशेज और खुजली, कैसे पहचानें कि यह एलर्जी है या इंफेक्शन ?

Skin Care Tips:मानसून की फुहारों के बीच बढ़ता फंगल इन्फेक्शन का खतरा आपकी स्किन का ग्लो छीन सकता है। ऐसे में यह जानना मुश्किल हो गया है कि वह एलर्जी, रैशेज और खुजली है। इस समस्या से बचने के लिए इन गलतियों से बचें और एक्सपर्ट्स के बताए आसान तरीकों से अपनी स्किन हमेशा हेल्दी रखें।
6 min read
Google source verification

भारत

image

MI Zahir

Jul 14, 2026

Monsoon Season Skin Care News.

मानसून सीजन में स्किन पर रैशेज और फंगल इंफेक्शन। (फोटो: गूगल जैमिनी एआई, डिजाइन: पत्रिका)

Monsoon Skin Care Tips: बारिश सभी को अच्छी लगती है, कोई बारिश में नहाता है तो कोई बारिश होने पर रास्ते में भीग जाता है। दरअसल मानसून की पहली फुहारें जहां तपती गर्मी से राहत देती हैं, वहीं वायुमंडल में अचानक बढ़ने वाली ह्यूमिडिटी हमारी स्किन के लिए कई तरह के चैलेंज ले कर आती है इसलिए हमें इस मौसम में स्किन का खास ध्यान रखना चाहिए। इस सीजन में स्किन पर रैशेज, रेडनेस और खुजली होना बेहद आम बात है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर तरह की खुजली या रैश एक जैसे नहीं होते? अधिकतर लोग बरसात में होने वाली किसी भी स्किन प्राब्लम को सामान्य एलर्जी समझ कर कोई भी एंटी-सेप्टिक क्रीम या घरेलू नुस्खा आजमाने लगते हैं। तब सवाल पैदा होता है कि क्या करना चाहिए।

भारत में स्किन व फंगल इंफेक्शन की रिसर्च के आधार पर तथ्य और आंकड़े। ( विजुअल:CHATGPT)

मानसून के दौरान स्किन इन्फेक्शन और एलर्जी का खतरा बढ़ जाता है

ग्लोबल डर्मेटोलॉजी जर्नल्स की क्लीनिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, मानसून के दौरान स्किन इन्फेक्शन और एलर्जी का खतरा लगभग 80 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। लेकिन गलत इलाज या गलत पहचान के कारण यह समस्या और अधिक गंभीर रूप ले लेती है। अपनी स्किन की सुरक्षा और उसका नेचुरल ग्लो बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि आप सबसे पहले यह पहचानना सीखें कि आपकी स्किन पर होने वाली समस्या 'एलर्जिक डर्मेटाइटिस' (Allergic Dermatitis) है या फिर कोई बैक्टीरिया या फंगल इन्फेक्शन (Fungal/Bacterial Infection) है।

दुनिया में स्किन रैशेज और फंगल इंफेक्शन का जायजा। ( फोटो: Google Gemini )

थीम 1: एलर्जिक डर्मेटाइटिस बनाम फंगल/बैक्टीरियल इंफेक्शन (The Core Difference)

मेडिकल साइंस के अनुसार, एलर्जी और इन्फेक्शन दोनों के होने के कारण, उनके लक्षण और उनके इलाज के तरीके पूरी तरह से अलग होते हैं। इन्हें समझने के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट्स ने कुछ मुख्य अंतर बताए हैं:

एलर्जिक डर्मेटाइटिस (Allergic Dermatitis) क्या है ?

यह तब होता है जब हमारी स्किन किसी बाहरी तत्व (Allergen) के सीधे संपर्क में आती है और हमारा इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) उसके प्रति ओवर-रिएक्ट करता है। बरसात के दिनों में हवा में तैरते परागकण (Pollen), फंगस के बीजाणु (Mold Spores), कीड़े-मकोड़ों के डंक, या सिंथेटिक व नायलॉन के तंग कपड़ों में जमा हुआ पसीना इसके मुख्य कारण होते हैं।

सिम्टम्स: स्किन पर अचानक छोटे-छोटे लाल दाने उभर आना, तेज खुजली होना, स्किन का अचानक सूखा या सूजा हुआ महसूस होना। यह समस्या अक्सर शरीर के उन हिस्सों पर तुरंत दिखती है जो बाहरी वातावरण या कपड़ों के सीधे संपर्क में आते हैं।

फंगल और बैक्टीरियल इंफेक्शन (Fungal/Bacterial Infection) क्या है?

यह समस्या किसी बाहरी तत्व के प्रति रिएक्शन नहीं है, बल्कि स्किन पर सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) जैसे कवक (Fungus) या जीवाणुओं (Bacteria) के अनियंत्रित रूप से बढ़ने के कारण होती है। उमस भरे मौसम में जब पसीना और बारिश का प्रदूषित पानी त्वचा की सलवटों में लंबे समय तक जमा रहता है, तो 'टीनिया' (दाद या रिंगवॉर्म) और 'एथलीट फुट' जैसे फंगल इन्फेक्शन पनपते हैं।

सिम्टम्स: फंगल इन्फेक्शन की मुख्य पहचान यह है कि यह स्किन पर एक साफ गोलाकार (Ring-shaped) आकृति बनाता है, जिसके किनारे लाल और उभरे हुए होते हैं। इसमें खुजली के साथ-साथ स्किन सफेद होने लगती है, छिलने लगती है और प्रभावित हिस्से से तीखी गंध भी आ सकती है। वहीं बैक्टीरियल इन्फेक्शन में स्किन पर मवाद (Pus) से भरे दाने या बालतोड़ जैसी दर्दनाक गिल्टियां हो सकती हैं।

थीम 2 : घरेलू उपाय कब तक सुरक्षित हैं? (The Limits of Home Remedies)

भारतीय घरों में स्किन की समस्याओं के लिए नीम, हल्दी, एलोवेरा या टी-ट्री ऑइल जैसे पारंपरिक घरेलू नुस्खों का सदियों से इस्तेमाल किया जाता रहा है। ब्रिटिश जर्नल ऑफ डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित शोधों के अनुसार, प्राकृतिक तत्वों में मौजूद एंटी-सेप्टिक गुण शुरुआती स्तर की स्किन की समस्याओं में राहत देने के लिए असरदार साबित होते हैं।

बारिश में भीगने पर स्किन के लिए ये एहतियात बरतें

अगर आपको बारिश में भीगने के फौरन बाद हल्की खुजली या रैश महसूस हो रहा है, तो नीम के पानी से नहाना, प्रभावित स्थान पर शुद्ध एलोवेरा जेल लगाना या नारियल के तेल में थोड़ा सा काफूर मिलाकर लगाना फायदेमंद हो सकता है। यह स्किन को शांत करता है और शुरुआती सूजन कम करता है।

स्किन के लिए कब अलर्ट हो जाएं ?

स्किन केयर के घरेलू उपाय महत प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) की तरह हैं। वे किसी गंभीर फंगल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन को जड़ से खत्म नहीं कर सकते। अगर आप किसी दाद या एक्टिव फंगल स्किन पर डॉक्टर की सलाह लिए बिना लगातार घरेलू लेप लगाते रहते हैं, तो उस हिस्से की नमी बढ़ सकती है, जिससे फंगस को पनपने के लिए और अधिक अनुकूल माहौल मिल जाता है।

थीम 3: मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत कब पड़ती है? (When to See a Doctor)

स्किन केयर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, स्किन के मामलों में सबसे बड़ी गलती 'सेल्फ-मेडिकेशन' (Self-medication) यानि खुद से मेडिकल स्टोर से कोई भी स्टेरॉयड युक्त क्रीम खरीद कर लगा लेना है। यह आदत इन्फेक्शन को दबा देती है, जो बाद में और अधिक गंभीर हो कर उभरता है। आपको ऐसे हालात में बिना समय गंवाए किसी योग्य त्वचा रोग ​विशेषज्ञ (Dermatologist) से संपर्क करना चाहिए:

सिम्टम्स का लगातार बढ़ना: अगर घरेलू उपाय आजमाने या स्किन सूखी रखने के बाद भी रैशेज या खुजली 3 से 4 दिनों के अंदर ठीक नहीं हो रही है, बल्कि बॉडी के अन्य हिस्सों में फैल रही है।

तेज दर्द और मवाद: अगर स्किन के दानों में मवाद (Pus) भरने लगे, प्रभावित हिस्से के आसपास सूजन आ जाए या छूने पर तेज दर्द का अहसास हो तो यह गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण का संकेत है।

बुखार या बीमार होना: अगर स्किन रैशेज के साथ-साथ आपको हल्का बुखार, ठंड लगना या शारीरिक कमजोरी महसूस हो रही हो।

स्किन का फटना या खून आना: खुजली की वजह से अगर स्किन की ऊपरी परत पूरी तरह छिल गई हो और वहां से पानी या खून रिसने लगा हो।

डर्मेटोलॉजिस्ट्स की स्पेशल मेडिकल गाइडलाइन (Prevention Strategy)

मानसून के इस मौसम में एलर्जी और इन्फेक्शन दोनों से बचे रहने के लिए मेडिकल जर्नल्स के शोध पर आधारित इन 4 आदतों को तुरंत अपनाएं:

डबल क्लींजिंग रूटीन: दिन में दो बार सल्फेट-मुक्त और सौम्य (Mild) क्लींजर से चेहरा और शरीर साफ करें। नहाने के लिए टी-ट्री ऑइल या नीम के अर्क वाले मेडिकेटेड सोप का प्रयोग करें।

स्किन को सूखा (Dry) रखना: बारिश में भीगने के फौरन बाद साफ पानी से नहाएं और पूरे शरीर को अच्छी तरह सुखाएं। उंगलियों के बीच और जांघों के जोड़ पर रोज एंटी-फंगल डस्टिंग पाउडर लगाएं।

जेल-बेस्ड मॉइश्चराइजेशन: स्किन चिपचिपी होने के डर से मॉइश्चराइजर पूरी तरह बंद न करें। हैवी क्रीम की जगह लाइटवेट 'जेल-बेस्ड' या 'वॉटर-बेस्ड' मॉइश्चराइजर लगाएं ताकि स्किन का नेचुरल बैरियर मजबूत रहे।

हाइजीन और फैब्रिक: सिंथेटिक, नायलॉन या ज्यादा तंग कपड़ों को अलविदा कहें। केवल 100% सूती (Cotton) और ढीले कपड़े पहनें, जो पसीना आसानी से सुखा सकें और स्किन को हवा लगने दें। अपने जूते-चप्पल पूरी तरह सुखाने के बाद ही दोबारा पहनें।

आवश्यकता पड़ने पर तुरंत सही मेडिकल ट्रीटमेंट लें

बहरहाल, मानसून का मौसम आनंद लेने के लिए है, न कि स्किन की बीमारियों से परेशान होने के लिए। बारिश में स्किन पर होने वाले किसी भी बदलाव को नजरअंदाज न करें। एलर्जी और इन्फेक्शन के बारीक अंतर को समझें, घरेलू उपायों को सीमित रखें और आवश्यकता पड़ने पर तुरंत सही मेडिकल ट्रीटमेंट लें ताकि आपकी त्वचा की कुदरती चमक और सेहत इस सुहाने मौसम में भी पूरी तरह कायम रहे।

देश के प्रख्यात मशहूर सीनियर डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ.दीपक कुमार माथुर ने बारिश में स्किन पर रैशेज और फंगल इंफेक्शन के बारे में बताया। (फोटो डिजाइन:पत्रिका)

'बारिश में गर्मी व उमस के कारण होते हैं एलर्जी और फंगल इन्फेक्शन'

मानसून मे गर्मी के साथ उमस बढ़ जाती है, उमस में दो तरह की समस्याएं सामने आने की संभावना रहती ​है। एक एलर्जी और दूसरा फंगल इन्फेक्शन। ये दोनों अलग-अलग बीमारियां हैं, दोनों का इलाज अलग है। फंगल इन्फेक्शन के निशान होने पर गोल-गोल रिंग बनते हैं, जिन्हें हम पहचान सकते हैं, इसे रिंग वार्म इन्फेक्शन या फफूंद कहते हैं। पुरुषों में जांघ और कूल्हों के नीचे और महिलाओं में जांघ और कूल्हों के साथ-साथ स्तन के नीचे और बगल में फफूंद का इंफेक्शन हो जाता है। इस बीमारी के सटीक इलाज वाली दवाइयां मौजूद हैं।

एलर्जी में शरीर के किसी भी हिस्से में तेज खुजली होती है और ये बारीक-बारीक दानों के रूप में होती हैं,जिसमें लगातार खुजली करने पर पानी में मवाद का स्राव शुरू हो जाता है। गर्मियों और उमस में एक दूसरी बीमारी जिन्हें हम घमौरियां या अलाइयां कहते हैं, वो हो जाती हैं, इनसे बचने के लिए हमें तंग कपड़े पहनने से बचना चाहिए और प्रचुर मात्रा में विटामिन सी वाले भोज्य पदार्थ नींबू, सलाद, मौसमी व नारंगी और पाइनेपल आदि लेना चाहिए।

-डॉ.दीपक कुमार माथुर, मशहूर सीनियर डर्मेटोलॉजिस्ट, जयपुर।