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Coral Reef : कैसे बनते हैं कोरल रीफ, क्यों हैं समुद्र की जीवनरेखा और ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?

Coral Reefs And Nicobar Project : कोरल रीफ (कोरल पॉलीप) क्या हैं और कैसे बनते हैं? जानें क्यों इन्हें समुद्र की जीवनरेखा कहा जाता है और ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को लेकर पर्यावरणविद् क्यों चिंतित हैं।
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Coral Reef : अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एक बार फिर चर्चा में हैं। इसकी वजह यहां प्रस्तावित ग्रेट निकोबार मेगा डेवलपमेंट प्रोजेक्ट है, जिसके तहत ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप और अन्य बुनियादी ढांचे का विकास किया जाना है। इस परियोजना के बीच सबसे अधिक चर्चा कोरल रीफ (Coral Reef) की हो रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि परियोजना का असर समुद्री जैव विविधता पर पड़ सकता है, जबकि सरकार का दावा है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कोरल रीफ क्या हैं, ये कैसे बनते हैं, समुद्री जीवन के लिए इनकी क्या उपयोगिता है और इन्हें लेकर विवाद क्यों खड़ा हुआ है? आइए विस्तार से समझते हैं…।

क्या होते हैं कोरल रीफ?

कोरल रीफ समुद्र के भीतर बनने वाली प्राकृतिक चट्टानें हैं, लेकिन इन्हें सामान्य पत्थर समझना बड़ी भूल होगी। ये करोड़ों छोटे-छोटे जीवों कोरल पॉलीप (Coral Polyps) द्वारा बनाई गई जीवित संरचनाएं होती हैं। प्रत्येक पॉलीप अपने शरीर के चारों ओर कैल्शियम कार्बोनेट का कठोर ढांचा बनाता है। समय के साथ लाखों-करोड़ों पॉलीप एक-दूसरे के ऊपर नई परतें बनाते जाते हैं और धीरे-धीरे विशाल कोरल रीफ का निर्माण होता है।

कोरल रीफ मुख्य रूप से ऐसे समुद्री क्षेत्रों में विकसित होते हैं जहां पानी साफ, गर्म और उथला होता है। सामान्यतः 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले समुद्री जल को इनके विकास के लिए अनुकूल माना जाता है। सूर्य का प्रकाश भी इनके लिए आवश्यक होता है, क्योंकि इनके भीतर रहने वाली सूक्ष्म शैवाल (Zooxanthellae) प्रकाश संश्लेषण के जरिए भोजन तैयार करती हैं और कोरल को ऊर्जा प्रदान करती हैं। इसी कारण कोरल रीफ समुद्र की सतह से बहुत अधिक गहराई में नहीं पाए जाते।

कैसे बनते हैं कोरल रीफ?

कोरल रीफ का निर्माण एक बेहद धीमी प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसकी शुरुआत तब होती है जब समुद्र तल पर किसी कठोर सतह पर कोरल पॉलीप चिपक जाते हैं। इसके बाद वे लगातार विभाजित होकर अपनी संख्या बढ़ाते हैं और कैल्शियम कार्बोनेट का ढांचा तैयार करते रहते हैं।

जब कोई पॉलीप मर जाता है तो उसका कठोर ढांचा वहीं बना रहता है। उसके ऊपर नए पॉलीप बस जाते हैं और नई परत बना देते हैं। हजारों वर्षों तक यही प्रक्रिया चलती रहती है। धीरे-धीरे छोटे समूह विशाल चट्टानों का रूप ले लेते हैं, जिन्हें कोरल रीफ कहा जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार कई कोरल रीफ की वृद्धि दर सालाना केवल कुछ मिलीमीटर से लेकर लगभग 10 सेंटीमीटर तक होती है। इसलिए हजारों वर्षों में ही विशाल रीफ विकसित हो पाते हैं। यही कारण है कि यदि किसी कोरल रीफ को नुकसान पहुंचता है तो उसकी भरपाई बहुत धीरे-धीरे होती है।

कोरल रीफ की उपयोगिता क्या है?

कोरल रीफ को समुद्र का 'रेनफॉरेस्ट' कहा जाता है। दुनिया के कुल समुद्री क्षेत्र का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा घेरने के बावजूद ये लगभग 25 प्रतिशत समुद्री जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं। इनकी सबसे बड़ी उपयोगिता समुद्री जैव विविधता को बनाए रखना है। हजारों प्रकार की मछलियां, केकड़े, झींगे, समुद्री कछुए, ऑक्टोपस और अनेक सूक्ष्म जीव अपने जीवन के किसी न किसी चरण में कोरल रीफ पर निर्भर रहते हैं।

कोरल रीफ तटीय क्षेत्रों को समुद्री तूफानों और ऊंची लहरों से भी सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये प्राकृतिक अवरोध (Natural Barrier) की तरह काम करते हैं और लहरों की ऊर्जा को कम कर समुद्री कटाव को रोकते हैं। इससे समुद्र तटों, द्वीपों और तटीय आबादी की सुरक्षा होती है।

इसके अलावा मत्स्य पालन उद्योग भी काफी हद तक कोरल रीफ पर निर्भर करता है। लाखों लोगों की आजीविका समुद्री मत्स्य संसाधनों से जुड़ी है। पर्यटन उद्योग में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान है। स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और समुद्री पर्यटन के लिए दुनिया भर से पर्यटक कोरल रीफ वाले क्षेत्रों में पहुंचते हैं।

चिकित्सा विज्ञान में भी कोरल रीफ का महत्व लगातार बढ़ रहा है। समुद्री जीवों से प्राप्त कई जैविक यौगिकों पर कैंसर, संक्रमण और अन्य बीमारियों की दवाओं के विकास के लिए शोध किए जा रहे हैं।

कोरल रीफ को वैज्ञानिक सामान्यतः तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटते हैं।

फ्रिंजिंग रीफ (Fringing Reef) : यह समुद्र तट के बिल्कुल पास विकसित होती है और सीधे तट से जुड़ी रहती है। भारत के कई तटीय क्षेत्रों में इस प्रकार की रीफ देखने को मिलती है।

बैरियर रीफ (Barrier Reef) : यह तट से कुछ दूरी पर स्थित होती है। इसके और तट के बीच अपेक्षाकृत गहरा जल क्षेत्र होता है। दुनिया की सबसे बड़ी ग्रेट बैरियर रीफ ऑस्ट्रेलिया में स्थित है।

एटोल (Atoll) : यह गोलाकार या छल्ले जैसी संरचना होती है जिसके बीच में लैगून (Lagoon) बन जाता है। भारत के लक्षद्वीप द्वीप समूह में एटोल प्रकार की कोरल रीफ प्रमुख रूप से पाई जाती हैं।

भारत में कहां-कहां पाए जाते हैं कोरल रीफ?

भारत में कोरल रीफ मुख्य रूप से चार क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

  • अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह
  • लक्षद्वीप
  • तमिलनाडु का गल्फ ऑफ मन्नार
  • गुजरात का गल्फ ऑफ कच्छ

इनमें अंडमान एवं निकोबार के कोरल रीफ जैव विविधता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यहां अनेक दुर्लभ समुद्री जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से चिंतित क्यों हैं पर्यावरणविद

ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों ने कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य से समुद्री पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों की चिंता का एक प्रमुख कारण प्रभावित क्षेत्रों से हजारों कोरल कॉलोनियों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की योजना है। उनका तर्क है कि छोटे कोरल को स्थानांतरित करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन बड़े और कई दशक पुराने कोरल को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह बसाना बेहद चुनौतीपूर्ण है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि स्थानांतरण के दौरान कोरल क्षतिग्रस्त होते हैं तो उनकी पुनर्प्राप्ति में वर्षों या दशकों का समय लग सकता है। इसके अलावा निर्माण कार्य के दौरान समुद्र में तलछट (Sedimentation) बढ़ने, पानी की गुणवत्ता प्रभावित होने और समुद्री जीवों के आवास में बदलाव की आशंका भी जताई जा रही है।

विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान के कारण पहले से ही कोरल ब्लीचिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में यदि स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा तो नुकसान और गंभीर हो सकता है।

निकोबार प्रोजेक्ट सरकार के लिए क्यों अहम?

सरकार का कहना है कि ग्रेट निकोबार परियोजना देश के लिए रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री क्षमता को मजबूत करने, व्यापार को बढ़ावा देने और बुनियादी ढांचे के विकास में अहम भूमिका निभाएगी।

सरकारी एजेंसियों के अनुसार परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों के अनुरूप लागू किया जा रहा है। प्रभावित कोरल कॉलोनियों के वैज्ञानिक तरीके से स्थानांतरण, निगरानी और संरक्षण की योजना तैयार की गई है। संबंधित विशेषज्ञ संस्थानों की मदद से कोरल ट्रांसलोकेशन और पुनर्जीवन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

सरकार का कहना है कि विकास कार्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी समान प्राथमिकता दी जा रही है और परियोजना के दौरान निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा।

कोरल रीफ के सामने खड़ी हैं कई चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि कोरल रीफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विकास परियोजनाएं नहीं हैं। समुद्र का बढ़ता तापमान, समुद्री प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, अत्यधिक मछली पकड़ना और समुद्र का अम्लीकरण (Ocean Acidification) भी इन पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं।

जब समुद्र का तापमान लंबे समय तक सामान्य से अधिक रहता है तो कोरल अपने भीतर रहने वाली शैवाल को बाहर निकाल देते हैं। इससे उनका रंग सफेद पड़ जाता है, जिसे कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो कोरल की मृत्यु भी हो सकती है।

राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे समुद्री राष्ट्र के लिए बुनियादी ढांचे का विकास आवश्यक है, लेकिन इसके साथ समुद्री पारिस्थितिकी का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कोरल रीफ केवल समुद्री जीवों का घर नहीं हैं, बल्कि तटीय सुरक्षा, मत्स्य संसाधन, पर्यटन और जलवायु संतुलन से भी जुड़े हुए हैं।

इसी वजह से ग्रेट निकोबार परियोजना के साथ कोरल रीफ संरक्षण का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया जाता है।