
Sonam Wangchuk Hunger Strike : सोनम वांगचुक के अनशन की अन्ना हजारे के आंदोलन से हो रही तुलना, PC- Patrika
Sonam Wangchuk Hunger Strike : भारतीय लोकतंत्र में अनशन केवल विरोध का माध्यम नहीं रहा, बल्कि सत्ता से जवाब मांगने का सबसे नैतिक और प्रभावशाली तरीका भी माना गया है। महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण और अन्ना हजारे तक, कई आंदोलनों ने अनशन के जरिए देश की राजनीति को प्रभावित किया है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
वांगचुक के अनशन की तुलना 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन से की जा रही है। सवाल उठ रहा है कि जिस तरह अन्ना हजारे के अनशन को देशव्यापी समर्थन, 24 घंटे मीडिया कवरेज और राजनीतिक दलों का साथ मिला था, वैसा माहौल सोनम वांगचुक के लिए क्यों दिखाई नहीं दे रहा?
हालांकि दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में एक समान सवाल मौजूद है- क्या सरकार जनता की बात सुन रही है और क्या समाज हर मुद्दे पर समान संवेदनशीलता दिखाता है?
साल 2011 में यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान देश में भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे बड़ी राजनीतिक बहस बन चुका था। 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स और कोयला आवंटन जैसे कथित घोटालों को लेकर सरकार विपक्ष और जनता के निशाने पर थी।
इसी माहौल में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया। उनका संदेश बेहद सरल था, ‘भ्रष्टाचार खत्म करो और एक मजबूत लोकपाल बनाओ।’
यह संदेश सीधे आम लोगों की भावनाओं से जुड़ गया। देशभर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। टीवी चैनलों पर लगातार लाइव कवरेज हुई। बॉलीवुड हस्तियों से लेकर उद्योग जगत और विपक्षी दलों तक ने आंदोलन को समर्थन दिया। देखते ही देखते अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी जनभावना का चेहरा बन गए।
आखिरकार सरकार को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा और जनलोकपाल को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ा। यही आंदोलन आगे चलकर भारतीय राजनीति में बड़े बदलावों का कारण बना।
सोनम वांगचुक लद्दाख के प्रसिद्ध शिक्षाविद, इंजीनियर, नवाचारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्हें शिक्षा सुधार और सामाजिक नवाचार के लिए वर्ष 2018 में ‘रमन मैग्सेसे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।
उन्होंने लद्दाख में SECMOL की स्थापना की और ‘आइस स्तूप’ तकनीक विकसित की, जो हिमालयी क्षेत्रों में जल संरक्षण का एक अभिनव मॉडल माना जाता है। फिल्म 3 Idiots के लोकप्रिय किरदार फुंसुख वांगड़ू की प्रेरणा भी उनके व्यक्तित्व को माना जाता है।
सोनम वांगचुक इस समय दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल पर हैं। आंदोलनकारी शिक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठा रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग है कि परीक्षा गड़बड़ियों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। इसके अलावा शिक्षा व्यवस्था में सुधार और छात्रों के हितों की सुरक्षा की मांग भी की जा रही है।
वांगचुक का कहना है कि यह केवल छात्रों का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य और व्यवस्था में जवाबदेही का सवाल है।
आंदोलन से जुड़े लोगों के मुताबिक सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है। संगठन ने दावा किया है कि अनशन के दौरान उनका वजन 8 किलोग्राम से अधिक कम हो चुका है।
संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर कहा कि वांगचुक की मांसपेशियों का वजन कम होना शुरू हो गया है और वे शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो गए हैं।
दीपके के अनुसार जब लोगों ने उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की तो वांगचुक ने कहा कि उनसे अनशन खत्म करने को कहने के बजाय सरकार से पूछा जाए कि वह बातचीत के लिए आगे क्यों नहीं आ रही।
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सोनम वांगचुक की सेहत को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि वांगचुक ने न्याय की लड़ाई में युवाओं को एकजुट किया है और सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए।
महुआ मोइत्रा ने वांगचुक से अनशन समाप्त करने की अपील भी की। वहीं आंदोलन से जुड़े अन्य संगठनों और छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार की ओर से अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
अन्ना हजारे और सोनम वांगचुक की तुलना का सबसे बड़ा कारण है, ‘जंतर-मंतर, अनशन और नैतिक दबाव की राजनीति।’ दोनों ने चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी। दोनों ने गांधीवादी रास्ता चुना। दोनों ने सत्ता से जवाब मांगा। लेकिन दोनों को मिली प्रतिक्रिया में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है।
2011 में अन्ना हजारे का आंदोलन राष्ट्रीय जनलहर बन गया था। वहीं 2026 में सोनम वांगचुक का अनशन अभी तक सीमित दायरे में चर्चा का विषय बना हुआ है।
अन्ना हजारे का मुद्दा भ्रष्टाचार था। यह ऐसा विषय था जिससे हर वर्ग सीधे जुड़ाव महसूस करता था। सरकारी दफ्तरों से लेकर बड़े घोटालों तक, भ्रष्टाचार लोगों के रोजमर्रा के अनुभव का हिस्सा था।
दूसरी तरफ सोनम वांगचुक जिन मुद्दों को उठाते रहे हैं, उनमें जलवायु परिवर्तन, हिमालयी पारिस्थितिकी, ग्लेशियर संरक्षण, शिक्षा सुधार, स्थानीय अधिकार और पर्यावरणीय संतुलन शामिल हैं।
ये विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनका प्रभाव अपेक्षाकृत दीर्घकालिक और जटिल है। यही वजह है कि इन्हें जनआंदोलन में बदलना अपेक्षाकृत कठिन माना जाता है।
2011 में केंद्र में कांग्रेस की यूपीए सरकार थी और विपक्ष सरकार को घेरने के लिए मजबूत मुद्दों की तलाश में था। इसलिए अन्ना आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिला।
आज परिस्थितियां अलग हैं। केंद्र में भाजपा की मजबूत सरकार है और विपक्ष पहले की तुलना में बिखरा हुआ दिखाई देता है। ऐसे में किसी आंदोलन का राष्ट्रीय राजनीतिक अभियान बन पाना आसान नहीं रह गया है।
प्रसिद्ध शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के समर्थन में अनशन पर बैठे हैं। यह आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को लेकर किया जा रहा है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग है कि परीक्षा गड़बड़ियों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें। इसके अलावा परीक्षा से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच, छात्रों के हितों की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग भी उठाई जा रही है।
सोनम वांगचुक का कहना है कि यह केवल छात्रों का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के युवाओं के भविष्य और व्यवस्था में जवाबदेही का सवाल है। इसी वजह से उन्होंने आंदोलन को समर्थन देते हुए भूख हड़ताल शुरू की।
अन्ना हजारे और सोनम वांगचुक के आंदोलनों में समानता यह है कि दोनों ने लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीके से सरकार से जवाब मांगा।
फर्क यह है कि अन्ना का आंदोलन तत्काल राजनीतिक बदलाव का प्रतीक बन गया, जबकि वांगचुक का आंदोलन शिक्षा, पर्यावरण और जवाबदेही जैसे दीर्घकालिक मुद्दों पर बहस छेड़ रहा है।
एक आंदोलन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना को आवाज दी थी, जबकि दूसरा आंदोलन युवाओं के भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और व्यापक सामाजिक जवाबदेही पर सवाल उठा रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janta Party-CJP) वर्ष 2026 में शुरू हुआ एक व्यंग्यात्मक (सैटायर) सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन है, जिसकी स्थापना अभिजीत दीपके ने की थी। यह कोई चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि युवाओं, छात्रों और आम लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाने वाला एक जन अभियान है।
संगठन का दावा है कि वह शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा में पारदर्शिता, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आवाज उठाता है। हाल के महीनों में यह संगठन परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों से जुड़े मामलों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है।
'कॉकरोच' नाम को संगठन ने एक प्रतीक के रूप में अपनाया है। इसके संस्थापकों का कहना है कि जैसे कॉकरोच कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है, उसी तरह आम नागरिक भी तमाम चुनौतियों के बावजूद अपनी लड़ाई जारी रखता है। इसी सोच के साथ संगठन ने 'मैं भी कॉकरोच' जैसे अभियान चलाए हैं।
हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर CJP राष्ट्रीय चर्चा में आया। शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी इस आंदोलन के समर्थन में अनशन पर बैठे हैं, जिसके बाद संगठन को और अधिक सार्वजनिक ध्यान मिला है।
Updated on:
14 Jul 2026 04:27 pm
Published on:
14 Jul 2026 04:27 pm
