
Heatwave Effect: पश्चिमी यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है। रिकॉर्डतोड़ गर्मी से सिर्फ आम जन जीवन ही नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन (Energy Production) पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। फ्रांस में गारोन, रोन और म्यूज नदियों के किनारे स्थित तीन परमाणु रिएक्टरों को इस सप्ताह अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। इसकी वजह यह रही कि जिन नदियों के पानी से इन रिएक्टरों को ठंडा किया जाता है, उनका तापमान असामान्य रूप से बढ़ गया।
नदियों का पानी पानी इतना गर्म हो गया कि रिएक्टरों की सुरक्षित कूलिंग प्रणाली प्रभावित होने लगी थी। परमाणु सुरक्षा मानकों के तहत ऐसी स्थिति में रिएक्टरों का संचालन जारी रखना जोखिम भरा माना जाता है। इसलिए रिएक्टरों को बंद करने का फैसला लिया गया। यूरोप में सामने आई इस स्थिति ने दुनिया के कई देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
भारत ने भी हाल के वर्षों में रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव का सामना किया है, जहां बिजली की मांग 270 गीगावाट के पार पहुंच गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत के परमाणु बिजली संयंत्र भी इसी तरह की चुनौती का सामना कर सकते हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल इसका जवाब 'न' है, क्योंकि भारत के अधिकांश परमाणु संयंत्रों की डिजाइन और स्थान का चयन देश की जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है।
भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर फिलहाल हीटवेव का कोई खतरा नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का समुद्र के किनारे स्थित होना है। भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता का बड़ा हिस्सा समुद्र तट पर स्थित है। इनमें तमिलनाडु का कुडनकुलम, महाराष्ट्र का तारापुर और तमिलनाडु का कलपक्कम परमाणु संयंत्र प्रमुख हैं। हाल ही में कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने क्रिटिकलिटी हासिल कर देश की परमाणु तकनीक में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की है।
समुद्र तट पर स्थित होने से सबसे बड़ा लाभ है कि इन्हें ठंडा करने के लिए सीधे समुद्र के पानी का उपयोग किया जाता है। समुद्र का जल भंडार अत्यंत विशाल होता है और उसका तापमान नदियों की तुलना में काफी स्थिर रहता है। हीटवेव के दौरान भी समुद्र का तापमान अचानक इतना नहीं बढ़ता कि परमाणु रिएक्टरों की कूलिंग व्यवस्था प्रभावित हो जाए। यही कारण है कि फ्रांस जैसी स्थिति भारत के तटीय संयंत्रों में बनने की संभावना काफी कम रहती है।
भारत के कुछ परमाणु संयंत्र मैदानी इलाकों में भी स्थित हैं। इनमें राजस्थान का रावतभाटा, उत्तर प्रदेश का नरोरा और गुजरात का काकरापार प्रमुख हैं। इन संयंत्रों को भारत की उष्णकटिबंधीय जलवायु और लंबे गर्मी के मौसम को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। इन रिएक्टरों की सबसे बड़ी विशेषता इनके विशाल नेचुरल ड्राफ्ट कूलिंग टावर हैं।
ये संयंत्र गर्म पानी को सीधे नदी में वापस नहीं छोड़ते, बल्कि कूलिंग टावरों के जरिए वाष्पीकरण की प्रक्रिया से गर्मी को वातावरण में छोड़ते हैं। इससे नदी के पानी का तापमान अत्यधिक नहीं बढ़ता और रिएक्टरों की कूलिंग भी लगातार बनी रहती है। यही तकनीक भारत के परमाणु संयंत्रों को अत्यधिक गर्मी के दौरान भी सुरक्षित संचालन में मदद करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के परमाणु संयंत्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती पानी का गर्म होना नहीं, बल्कि पानी की उपलब्धता कम होना है। कूलिंग टावरों में लगातार पानी की जरूरत होती है, क्योंकि वाष्पीकरण के दौरान काफी मात्रा में पानी खर्च होता है। यदि लंबे समय तक भीषण सूखा पड़े, जलाशयों का जलस्तर अत्यधिक घट जाए और पर्याप्त पानी उपलब्ध न रहे, तो रिएक्टरों के संचालन पर असर पड़ सकता है। भारत पहले भी सूखे की वजह से कई कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्रों में उत्पादन प्रभावित होते देख चुका है।
जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में अत्यधिक गर्मी और सूखे की घटनाएं बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, जलाशयों का संरक्षण और परमाणु संयंत्रों की कूलिंग तकनीक को और मजबूत बनाना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा। मौजूदा समय में भारत की परमाणु ऊर्जा अवसंरचना हीटवेव जैसी परिस्थितियों से निपटने में सक्षम है, लेकिन बदलते जलवायु परिदृश्य को देखते हुए दीर्घकालिक रणनीति और सतत जल प्रबंधन पर लगातार निवेश करना आवश्यक होगा।
यूरोप में जून के आखिर में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की वजह से हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। 22 से 28 जून के बीच 27 यूरोपीय देशों में 10,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वालों में करीब 9000 लोगों की उम्र 65 साल या उससे ज्यादा थी। एक्सपर्ट्स कहना है कि साल के इस समय इतनी ज्यादा अतिरिक्त मौतें होना सामान्य नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टि से यूरोप में बड़ी तादाद में हुई मौतों का कोई खास कारण सामने नहीं आया है। इसलिए माना जा रहा है कि यह मौतें भीषण गर्मी की वजह से हुई हैं।
जून के आखिरी सप्ताह में फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन और यूरोप के कई दूसरे देशों में तापमान नए रिकॉर्ड तक पहुंच गया। कई जगह बिजली सप्लाई पर असर पड़ा, स्कूल बंद करने पड़े और लोगों को घर के अंदर रहने की सलाह दी गई। इसी दौरान मौतों का आंकड़ा भी तेजी से बढ़ गया। डॉक्टरों का कहना है कि ज्यादा उम्र के लोगों का शरीर तेज गर्मी को आसानी से नहीं झेल पाता। अगर उन्हें पहले से दिल या सांस की बीमारी हो, तो गर्मी में खतरा और बढ़ जाता है। जून के आखिरी हफ्ते में फ्रांस और बेल्जियम में सबसे ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं।
बेल्जियम के सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान के मुताबिक, साल 2000 के बाद किसी भी हीटवेव के दौरान वहां पहली बार इतनी ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज हुई हैं। एक अन्य वैज्ञानिक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि मई और जून की हीटवेव के दौरान सिर्फ इंग्लैंड और वेल्स में करीब 2700 लोगों की गर्मी से जुड़ी वजहों से मौत हुई। इनमें करीब 42 फीसदी मौतों के पीछे ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से बढ़ी अतिरिक्त गर्मी का असर था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाइमेट चेंज की वजह से अब हीटवेव पहले के मुकाबले ज्यादा बार आ रही हैं। अब हीटवेव पहले के मुकाबले ज्यादा खतरनाक होती जा रही हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, पहले से बीमार लोगों और लंबे समय तक तेज गर्मी में रहने वाले लोगों पर पड़ता है। इसलिए एक्सपर्ट लोगों को गर्मी से बचने और सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।