मेरठ

दारुल उलूम के मोहतमिम बोले हिंदू-मुस्लिम दोनों के पूर्वज एक

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हालांकि, वैचारिक प्रतिबद्धताओं और राजनीतिक ढांचे को सुव्यवस्थित करने में अनुमान से कहीं अधिक समय लगेगा।
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Updated: 14 Sep 2021, 4:59 PM IST
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मेरठ. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान का समर्थन करने वाले देवबंद के सदर मुदर्रिस अरशद मदनी का बयान राष्ट्रवादी मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में एक सही कदम माना जा रहा है। पत्रिका संवादादाता से फोन पर हुई बातचीत के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मसलों पर खुलकर बात की। उन्होंने अफगानिस्तान में गठबंधन बलों के खिलाफ बीस साल की लड़ाई के बाद तालिबान द्वारा सत्ता पर कब्जा करना धारणा से परे बताया। अरशद मदनी ने कहा कि अफगानिस्तान के घटनाक्रम को नाटकीय बताते हुए हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि कई विश्लेषकों ने नए तालिबान को एक आधुनिक, परिष्कृत संस्करण के रूप में पेश किया है जिसका पुराने तालिबान से बहुत कम संबंध है।

हिंदू-मुस्लिमों का डीएनए एक का समर्थन

हिंदू-मुस्लिम का डीएनए एक पर दारुल उलूम के सदर मुदर्रिस एवं जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि सैकड़ों बरस पहले मुल्क के बहुत से मुसलमानों के आदत-ओ-मिजाज से प्रभावित होकर हिन्दुओं ने इस्लाम कबूल कर लिया था। आज उनकी नस्लें मुल्क में मुसलमान हैं। उन्होंने उदाहरण स्वरूप बताया कि गुर्जर, राजपूत, त्यागी समेत बहुत सी बिरादरियों ने मुस्लिम अपना लिया था, जिनकी पीढ़ियां आज भी मुस्लिम हैं।

महिलाएं अपने भविष्य को लेकर हैं चिंचित

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हालांकि, वैचारिक प्रतिबद्धताओं और राजनीतिक ढांचे को सुव्यवस्थित करने में अनुमान से कहीं अधिक समय लगेगा। क्योंकि तालिबान ने अतीत में जो सख्ती की थी, उससे यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि वे पिछले 20 वर्षों में बदल गए हैं। यह इस तथ्य से उत्साहित है कि लोग देश छोड़ने के लिए बेताब हैं। वहां पर कुछ लोग राष्ट्रीय ध्वज के लिए लड़ने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। महिलाएं अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और विदेशी सरकारें अपने राजनयिकों और दूतावास के कर्मचारियों के बाहर निकलने का प्रबंधन कर रही हैं।

इदारे ने हमेशा से की है आतंकवाद की निंदा

अरशद मदनी, जो जमीयत उलेमा ए हिंद (ए) के अध्यक्ष और दारुल उलूम देवबंद के छात्रों के लिए एक पिता की तरह हैं, उन्होंने कहा कि तालिबान को देवबंद का समर्थन तभी मिलेगा जब वे अफगानिस्तान में शांतिपूर्ण, न्यायपूर्ण और सही वातावरण विकसित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता का आश्वासन देंगे। जिसके तहत सभी अफगानिस्तान के लोगों को सुरक्षित महसूस करना चाहिए। पिछले दशकों के दौरान भारत के दारुल उलूम देवबंद और तालिबान के बीच संबंध बनाने की कोशिश की है। जिसमें स्कूल पर कट्टरता फैलाने का आरोप लगाया गया है। मदनी ने कहा कि हालांकि, दारुल उलूम देवबंद ने हमेशा कहा है कि वे संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते। देश की धर्मनिरपेक्षता और मिली-जुली संस्कृति के प्रति उनका सम्मान अटूट है। दारुल उलूम ने हमेशा आतंकवाद की निंदा की है और दावा किया है कि यह इस्लाम के खिलाफ है। "आतंकवाद, निर्दोषों की हत्या, इस्लाम के खिलाफ है। यह प्रेम और शांति का विश्वास है, हिंसा का नहीं।"

तालिबानी अपने कार्य में परिवक्व दिखें और अंतराष्ट्रीय मानदंडों के साथ करें काम

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह देखना बहुत चिंता का विषय है कि तालिबान 2.0 एक राज्य अभिनेता के रूप में कैसा व्यवहार करेगा और राज्य के मामलों के प्रबंधन में धर्म की क्या भूमिका होगी। वर्तमान तालिबान अपने कार्यों में अधिक परिपक्व, विद्वान और सतर्क दिखता है और उसने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के साथ काम करने का संकेत दिया है। हालांकि, यह दिखाई दे रहा है कि धर्म मार्गदर्शक सिद्धांत होगा। उन्होंने कहा कि उल्लेखनीय घटनाओं में से एक देवबंद विचारधारा के साथ इसके संबंधों को देखना होगा। तालिबान ने अपनी धार्मिक अभिव्यक्ति, भाषा और अभिविन्यास, 1866 में ब्रिटिश भारत में स्थापित देवबंद से प्राप्त किया,जो एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन के रूप में उभरा। इसके सिद्धांत और इस्लामी कानून की कठोर व्याख्या अफगानिस्तान सहित कई अन्य देशों में फैल गई है।

तालिबान का सवाल निश्चित रूप से दारुल उलूम देवबंद के दायरे से बाहर

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि देवबंद ने हमेशा चरमपंथी और कट्टरपंथी संगठनों से दूरी बनाने की कोशिश की है। यह स्पष्ट है कि कुछ लोग देख रहे होंगे कि तालिबान के उदय पर देवबंद उलेमा कैसे प्रतिक्रिया देंगे। दारुल उलूम स्पष्ट रूप से समझाना चाहता है कि तालिबान के उदय का उन पर प्रभाव पड़ता है और इस पर कोई भी बयान देने का मतलब विवादों में पड़ना होगा। यह कहते हुए कि तालिबान का उदय अंतरराष्ट्रीय समुदाय और क्षेत्रीय पड़ोसियों के लिए एक चिंता का विषय है। देवबंद जैसे धार्मिक स्कूलों को शिक्षा देने पर ध्यान देना चाहिए और विवादों में पड़ने से बचना चाहिए।

BY: KP Tripathi

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