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CBI विवाद: मोदी सरकार को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने का फैसला रद्द किया

आलोक वर्मा सीबीआई निदेशक बने रहेंगे। हालांकि वह कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकते हैं।

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29 नवंबर तक टला CBI मामला: क्या सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट लीक होने का अंदेशा है? जानें क्यों नाराज हुए CJI रंजन गोगोई

नई दिल्ली। देश की प्रमुख जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के निदेशक आलोक वर्मा (Alok Verma) की याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अपना फैसला सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने का फैसला रद्द कर दिया है। हालांकि आलोक वर्मा अभी नीतिगत फैसला नहीं ले सकते हैं। आलोक वर्मा नई जांच शुरू नहीं करवा पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, कानून के तहत सीबीआई निदेशक को छुट्टी पर भेजने का अधिकार नहीं।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश संजय किशन कौल और न्यायाधीश के.एम. जोसेफ की पीठ ने वर्मा को पद पर बहाल करते हुए कहा कि मामला सिलेक्शन कमेटी के पास जाएगा जो इस मुद्दे पर गौर करेगी। मुख्य न्यायाधीश गोगोई की ओर से फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश कौल ने कहा कि सिलेक्शन कमेटी मंगलवार से सात दिनों के भीतर बैठक करेगी और तब तक वर्मा किसी भी तरह के नीतिगत फैसले नहीं ले पाएंगे। इस कमेटी में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं।

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने जानकारी देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने फैसले में सरकार और सीवीसी के फैसले को रद्द कर दिया। आलोक वर्मा को निदेशक के तौर पर बहाली कर दी है। हालांकि वह कोई मुख्य नीतिगत फैसले नहीं जा सकेंगे। एक हफ्ते में उच्च स्तरीय कमेटी बनेगी। इस कमेटी में पीएम, सीजेआई और लोकसभा के नेता विपक्ष शामिल होंगे। कमेटी एक हफ्ते में कोई फैसला लेगी। जब तक कमेटी अपना फैसला नहीं लेती है तब तक आलोक वर्मा कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि आलोक वर्मा के लिए यह फैसला एक जीत की तरह है।

बता दें कि आज चीफ जस्टिस रंजन गोगोई छुट्टी पर थे इसलिए जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ ने फैसला सुनाया ।

गौरतलब है कि छह दिसंबर को सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने आलोक वर्मा और कॉमन कॉज की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा था। पीठ ने आलोक वर्मा, केन्द्र, केन्द्रीय सतर्कता आयोग और अन्य की दलीलों पर सुनवाई पूरी करते हुये कहा था कि इस पर निर्णय बाद में सुनाया जायेगा। सुनवाई के दौरान कई सवाल पीठ ने उठाए थे, चीफ जस्टिस ने कहा कि हमारी चिंता यह है कि क्या दो साल के कार्यकाल का नियम निदेशक पर अनुशासनात्मक कार्रवाई से भी ऊपर है? क्या दो साल उन्हें कोई छू नहीं सकता? सीवीसी की तरह सीबीआई निदेशक को सरंक्षण क्यों नहीं दिया गया? इस दौरान अगर निदेशक घूस लेते हुए पकड़े जाएं तो क्या वे एक पल भी निदेशक बने रह सकते हैं? गौरतलब है कि 31 जनवरी को आलोक वर्मा का कार्यकाल खत्म हो रहा है।

'बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे दोनों अफसर'
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल केके वेणुगोपाल कहा था कि आलोक वर्मा सिर्फ छुट्टी पर भेजे गए, CBI निदेशक आज भी वही हैं। वेणुगोपाल ने कहा कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच लड़ाई विकट और सार्वजनिक बहस का विषय बन रही थी। भारत सरकार हैरान थी कि शीर्ष अधिकारी क्या कर रहे थे, वे बिल्लियों की तरह लड़ रहे थे। " एजी ने साथ ही कहा कि सीबीआई में सार्वजनिक विश्वास बहाल करने के लिए सरकार की कार्रवाई जरूरी थी और एक स्थिति पैदा हो गई जिसमें केंद्र को दखल देना पड़ा। केंद्र की सावधानीपूर्वक जांच के बाद निर्णय लिया कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को शक्ति से हटा दिया जाएगा। केंद्र अगर यह कदम नहीं उठाता तो भगवान जाने दोनों अफसरों के बीच की लड़ाई कहां जाकर रुकती।

क्या है मामला?
CBI के निदेशक आलोक कुमार और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच अधिकारों की जंग छिड़ गई थी। जो सार्वजनिक भी हो गई थी। जिसके बाद सरकार ने गत वर्ष 23 अक्टूबर को दोनों अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित कर छुट्टी पर भेज दिया था। दोनों अधिकारियों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बना दिया। इस मामले पर राजनीति भी खूब हुई।

Updated on:
08 Jan 2019 01:53 pm
Published on:
08 Jan 2019 09:26 am
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