पर्यावरणविदों की मानें तो केरल में आई भयावह बाढ़ की वजह राज्य आपदा प्रबंधन विभाग की नाकामी है। जानिए क्यों हुआ इतना व्यापक नुकसान।
नई दिल्ली। दक्षिण भारतीय राज्य केरल केरल में आई मौजूदा शताब्दी की सबसे भयावह बाढ़ में अब तक 370 लोगों की जान चली गई है और करीब 7.50 लाख लोग इसे कुदरत का कहर बता रहे हैं। हालांकि पर्यावरणविद् इसे कुदरत का कहर कम और इंसानों की वजह से होने वाली घटना ज्यादा बताते हैं। तिरुवनंतपुरम निवासी पर्यावरण शोधकर्ता और कार्यकर्ता जयकुमार की मानें तो केरल में इस बाढ़ के पीछे राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की नाकामी प्रमुख कारण है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पर्यावरणविद् जयकुमार ने कहा, "हमारे राज्य का आपदा विभाग वास्तव में परेशानियों का अंदाजा लगाने में विपल रहा। विभाग को चिन्हित करना चाहिए था कि बांध में कितना जलस्तर रोका जा सकता है और जब बांध के पांचों द्वार खोले जाएंगे तो यह कितने क्षेत्रफल को अपने दायरे में लेंगा। विभाग जलस्तर को कम आंक रहा था, उन्हें लगा वह इस पर नियंत्रण कर सकते हैं। उन्हें जलग्रहण क्षेत्र की बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी। डर के चलते बांध के पांचों गेट खोल दिए गए और यह तबाही हुई।"
जयकुमार के मुताबिक प्रारंभिक रूप से विभाग बारिश की गणना मिलीमीटर में होने का अनुमान लगा रहे थे और अंदाजा था कि इतनी बारिश हुई तो इतना जलस्तर होगा लेकिन हकीकत में पानी मिलीमीटर से ज्यादा ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। विभाग तैयारी करने में विफल रहा कि इतना पानी इन द्वार से कैसे बाहर आएगा। जब भारी बारिश से बांध पूरी तरह भर गए और नदियां उफान पर बहने लगीं तो उन्हें भय सताने लगा। उन्हें इसका अनुमान नहीं था क्योंकि यह बहुत ही अप्रत्याशित था। इस समस्या की यह बहुत बड़ी वजह थी।
उन्होंने बताया कि इस बार सामान्य मानसून से 20 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज की गई। जबकि पिछले 16-17 सालों से यहां मानसून सामान्य नहीं था। इसलिए ऐसी स्थिति से निपटने के लिए राज्य के पास बहुत ही सीमित संसाधन थे। केरल में पिछले दो दशकों के दौरान नियमित मानसून न होने के चलते भी अधिकारी इस सच्चाई से बिल्कुल अनजान थे। लेकिन इस साल मानसून सामान्य रहा और पिछले 17 सालों में जहां 60 से 70 फीसदी बारिश होती थी, इस वर्ष पहले की तुलना में कहा जा सकता है कि बारिश में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राज्य में सामान्य तौर पर होने वाली वर्षा में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
26 साल बाद इडुक्की बांध के पांचों द्वारों एक साथ खोलने से हुए नुकसान के सवाल पर जयकुमार कहते हैं कि जब बांध का जलस्तर खतरे के निशान पर पहुंच गया तो उसे खोलना ही पड़ा। दरअसल पिछले 26 सालों से पानी उस स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा था लेकिन जब इतने सालों बाद गेट खोले गए तो किसी को अंदाजा ही नहीं था कि पानी किस दिशा में और कितनी तेजी से बहेगा।
उनके मुताबिक इतने लंबे समय तक बांध का जलस्तर न बढ़ने से नदियों में जलस्तर कम होता गया और स्थानीय लोगों ने नदी किनारों पर कब्जा कर न केवल निर्माण चालू कर दिया बल्कि उनमें रहने भी लगे। वहीं, नगर निगम ने वहां कूड़ा डालवाना चालू कर दिया। नदी के प्राकृतिक बहाव वाल रास्तों पर निगम और लोगों ने व्यवधान पैदा किए और इतना ज्यादा नुकसान हुआ।
जयकुमार की मानें, "आपदा प्रबंधन विभाग की विफलता यहीं से सामने आई। यहां बांधों की एक श्रृंखला बनी है और अधिकारियों का काम होता है कि वह देखें कि अगर हालात खराब हुए और बांध का जलस्तर अधिक हुए तो वह उसे छोटे या निचले बांधों में भेजें। इसके लिए उन छोटे बांधों को खाली करना पड़ता है या उसके पानी को कम किया जाता है ताकि उसमें आने वाले पानी को रोका जा सके, जबकि यहां छोटे बांध भी पूरे भरे हुए थे और उनकी यह तैयारी अधूरी रही।"
जयकुमार कहते हैं, "बारिश के चलते इडुक्की बांध का जलस्तर ज्यादा हो गया और पानी छोड़ दिया गया। इस बांध के साथ एर्नाकुलम, कोट्टायम समेत अन्य बांध भी पहले से पूरे भरे हुए थे। जब बांध से पानी छोड़ा गया तो पानी की मात्रा इतनी ज्यादा थी कि जिसका अंदाजा नहीं लगाया जा सका। यह पिछले 26 साल से खुले नहीं थे तो किसी को अंदाजा भी नहीं था कि पानी कितनी तेजी से बहेगा। आपदा विभाग की सारी गणना और आंकलन इस मौके पर गलत साबित हुए।"
राहत व बचाव कार्यों के बारे में जयकुमार का मानना है, "मुझे लगता है कि राहत एवं बचाव कार्यों में केंद्र सरकार नाकाम रही है। सेना को तीन दिन पहले ही राज्य में लगाया गया, पर मुझे नहीं पता ऐसा क्यों हुआ। राज्य सरकार का कहना है कि वह बार-बार हेलीकॉप्टरों और नावों की मांग कर रही है लेकिन अभी तक उतनी सहायता नहीं मिली है जितनी जरूरत है।"
उन्होंने कहा, "असल बात यह है कि बाढ़ से प्रभावित इडुक्की, कोट्टायम, एर्नाकुलम और पथनामथित्ता क्षेत्रों में ज्यादा मदद की जरूरत है क्योंकि यहां पानी अधिक है। यहां पानी ज्यादा होने का कारण यह है कि यह क्षेत्र नदियों के बहने वाले रास्ते पर बने हैं। शहरी विकास के नाम पर यहां निर्माण हुआ और लोग रहने लगे, अब यह क्षेत्र रिहायशी इलाकों में बदल गए हैं। यहां हेलीकॉप्टरों और नावों पर ज्यादा प्रशिक्षित सैनिकों की आवश्यकता है ताकि लोगों को बचाया जा सके।"
जयकुमार की मानें तो सरकार राज्य में 20 हजार करोड़ रुपए के नुकसान की बात बता रही है जबकि यहां 40 से 50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। बाढ़ के चलते पिछले साल की तुलना में राज्य को करीब 20 से 40 फीसदी की जीडीपी का नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई कुछ सालों में होना तो नामुमकिन है।