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करतारपुर गलियारा खुला तो खुश हुए सिद्धू, बोले- देखो मेरे दोस्त इमरान खान ने कमाल कर दिया

पाकिस्तान जाकर इमरान खान के शपथ ग्रहण में शामिल होने वाले कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने करतारपुर गलियारा खुलने पर खान को धन्यवाद कहा है।
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Updated: 7 Sep 2018, 10:52 PM IST
Navjot Singh Sidhu
करतारपुर गलियारा खुला तो खुश हुए सिद्धू, बोले- देखो मेरे दोस्त इमरान खान ने कमाल कर दिया

नई दिल्ली। पाकिस्तान जाकर इमरान खान के प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण में शामिल हो चुके कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने पाकिस्तान सरकार को करतारपुर गलियारे को खोलने पर धन्यवाद कहा है। गलियारा खुल जाने से भारत के श्रद्धालु पाकिस्तान स्थित एक गुरुद्वारे के दर्शन करने वहां जा सकेंगे, जो सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव से जुड़ा हुआ है। यह गुरुद्वारा भारत-पाकिस्तान की सीमा के पास है।

आज मेरी जिंदगी सफल हो गई: सिद्धू

पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने शुक्रवार को कहा कि आज मेरी जिंदगी सफल हो गई। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस धार्मिक गलियारे को खोलने का अपना वादा पूरा किया। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार को करतारपुर गलियारे के मुद्दे पर बात करने के लिए आमंत्रित किया था। सिद्धू ने कहा कि देखो मेरे मित्र ने क्या किया है। इसे करने के लिए मैं आपको लाख बार धन्यवाद देता हूं खान साब (इमरान खान)। उन्होंने कहा कि यह गुरु नानक के आशीर्वाद से संभव हो सका है।

सिद्धू ने फिर बताया- क्यों गए थे पाकिस्तान

सिद्धू ने उन लोगों (बीजेपी) की खिल्ली उड़ाई, जिन्होंने इसके पहले इस मुद्दे पर उनके बयानों की और इमरान खान के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के लिए आयोजित समारोह में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को गले लगाने के लिए आलोचना की थी। क्रिकेट से राजनीति में आए सिद्धू की भाजपा ने जनरल बाजवा को गले लगाने की आलोचना की थी। सिद्धू ने कहा कि पाकिस्तान सरकार ने कहा है कि भारतीय श्रद्धालुओं को करतारपुर गलियारे से वीजा बगैर सिख तीर्थस्थल जाने की अनुमति दी जाएगी।

क्या है करतारपुर गलियारा

करतारपुर गुरुद्वारा भारत-पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग चार किलोमीटर दूर है और भारतीय पंजाब के गुरदासपुर जिले में स्थित डेरा बाबा नानक में सीमा पट्टी के ठीक सामने है, जहां गुरु नानक देव ने 1539 में निधन तक अपने जीवन के 18 साल बिताए थे। अगस्त 1947 में विभाजन के बाद यह गुरुद्वारा पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। लेकिन सिख धर्म और इतिहास के लिए इसका बड़ा महत्व का है।

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