अपनी गलती को समझ मुस्कराकर रह गए लौहपुरुष
नई दिल्ली। उत्तर भारत में दाल-चावल को कच्चा और पूरी-कचौरी को पक्का भोजन कहा जाता है। लेकिन खांटी गुजराती सरदार पटेल को इस बात की जानकारी नहीं थी। एक दिन वे संत विनोवा भावे के आश्रम में जा पहुंचे। तय कार्यक्रम के मुताबिक उन्हें संत के यहां भोजन भी ग्रहण करना था।
सरदार पटेल के पहुंचने के बाद सामान्य जल-जलपान हुआ। इसके बाद रसोइया उनके सामने आया। उसने सरदार पटेल से पूछा, आप कच्चा भोजन खाएंगे या पक्का। सरदार पता नहीं किस मूड में थे। उन्होंने हंसते हुए कहा- भाई कच्चा क्यों खाएंगे, पक्का ही खाएंगे। उसके बाद वे संत से चर्चा में लग गए।
जब भोजन का समय हुआ तब सरदार पटेल हांथ-मुंह धोकर खाने के लिए बैठे। उनके सामने रसोइये ने पूरी, कचौरी और सब्जियां रख दीं। लेकिन हमेशा सादा खाना खाना ही पसंद करने वाले सरदार पटेल ने कहा कि अरे यह क्या? कुछ दाल, चावल या रोटी हो तो लाओ। यह सुनते ही रसोइये के होश उड़ गए। वह उनके सामने हाथ जोडक़र खड़ा हो गया। उसने कहा कि आज तो उसने उनसे पूछकर पक्का खाना ही बनाया है। तब सरदार पटेल को अपनी भूल का एहसास हुआ। वे समझ गए कि रसोइया कच्चा खाना और पक्का खाना पूछकर उनसे क्या जानना चाह रहा था।
फिलहाल, अपनी भूल पर मुस्कराए बिना वह नहीं रह सके और वही भोजन किया जो रसोइये ने बनाया था।
सरदार पटेल अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में बहुत सादगीपूर्ण ढंग से रहते थे। वे भोजन भी बहुत सादे ढंग से करते थे। लेकिन एक शब्द की गलतफहमी से उस दिन उन्हें अपने रूचि से अलग भोजन करना पड़ा।
इसी तरह की अनेक कहानियां और भी हैं जो यह बताने के लिए काफी हैं कि सरदार पटेल से खुद कोई भी गलती हो जाती थी, तो वे किसी दूसरे पर नाराजगी नहीं निकालते थे। बल्कि उससे शिक्षा लेकर वह आगे बढ़ जाते थे। उनकी ये कहानियां ये बताने के लिए काफी हैं कि वे एक महान व्यक्ति इसलिए नहीं थे कि वे एक महान पद पर बैठे, बल्कि वे महान इसलिए थे क्योंकि वे अपनी सामान्य जिंदगी में बहुत महान थे। महानता का यही लक्षण है कि खुद की गलती होने पर उसे मान लिया जाए और उसके लिए किसी दूसरे पर गुस्सा न उतारा जाए।