Ajit Pawar: करीब चार दशकों तक सक्रिय राजनीति में रहे दिग्गज नेता अजित पवार के भी ऐसे ही कई सपने थे। लेकिन बारामती आते समय हुए विमान हादसे ने न सिर्फ उनकी जिंदगी छीन ली, बल्कि उनके सपनों को भी अधूरा छोड़ दिया।
राजनीति में आने वाला हर कार्यकर्ता सीढ़ियां चढ़कर शिखर तक पहुंचना चाहता है। कोई नगरसेवक से विधायक बनना चाहता है, तो कोई मंत्री से मुख्यमंत्री। महाराष्ट्र की राजनीति में चार दशकों तक धाक जमाने वाले अजित पवार की भी कुछ ऐसी ही महत्वाकांक्षाएं थीं। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। बारामती के पास हुए विमान हादसे ने न केवल एक कद्दावर नेता को हमसे छीन लिया, बल्कि उनके उन दो बड़े सपनों को भी हमेशा के लिए अधूरा छोड़ दिया, जिनका इंतजार पूरा महाराष्ट्र कर रहा था।
महाराष्ट्र के दिग्गज नेता अजित पवार को उनके समर्थक ऐसे नेता के रूप में जानते थे, जो मुद्दा सही लगा तो निर्वाचन क्षेत्र के भीतर हो या बाहर, काम कराने में पीछे नहीं हटते थे। उन्होंने हजारों लोगों के सपनों को हकीकत में बदला। मगर विडंबना यह रही कि जिन सपनों को उन्होंने दूसरों के लिए पूरा किया, उनमें से कई अपने लिए अधूरे ही रह गए।
अजित दादा के बारे में मशहूर था कि ‘जो पेट में है, वही होंठों पर है’, उन्होंने कभी यह नहीं छिपाया कि वे मुख्यमंत्री बनकर महाराष्ट्र का नेतृत्व करना चाहते थे।
2004 का वो मौका: साल 2004 में जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के पास मुख्यमंत्री पद का मौका था, तब शरद पवार ने यह पद कांग्रेस को दे दिया।
डिप्टी सीएम का रिकॉर्ड: भले ही मुख्यमंत्री पद ने उन्हें बार-बार निराशा दी, लेकिन उन्होंने रिकॉर्ड बार उपमुख्यमंत्री बनकर राज्य की कमान संभाली। राज्य में मुख्यमंत्री बदलते रहे, लेकिन उपमुख्यमंत्री के तौर पर अजित पवार की मौजूदगी लगातार बनी रही। हाल के दिनों में उनके दौरों पर 'भावी मुख्यमंत्री' (Future Chief Minister) के पोस्टर लगना आम बात थी, लेकिन यह सपना उनके साथ ही चला गया।
अजित पवार का दूसरा सबसे बड़ा और भावनात्मक सपना था- बिखरे हुए राष्ट्रवादी परिवार को फिर से जोड़ना। राजनीतिक गलियारों में भले ही एनसीपी के दो फाड़ हो गए थे, लेकिन पवार परिवार के बीच का स्नेह खत्म नहीं हुआ था। पार्टी भले ही दो हिस्सों में बंट गई हो, लेकिन पवार परिवार में संवाद और अपनापन लगातार बना रहा। अजित पवार ही वह शख्स थे जो पुणे और पिंपरी-चिंचवड नगर निगम चुनावों के दौरान दोनों गुटों को साथ लाने के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय और आग्रही थे।
वे चाहते थे कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी फिर से एक हो जाए और पुरानी ताकत के साथ उभरे। उन्होंने कई मौकों पर इसके संकेत भी दिए थे। उनकी ही अगुवाई में राष्ट्रवादी कांग्रेस का विभाजन हुआ, लेकिन उससे पहले कि दोनों धड़े पूरी तरह एक हो पाते, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके साथ ही पार्टी के एकीकरण का सपना भी अधूरा रह गया।