मुंबई

पति ने शारीरिक संबंध बनाने से किया इनकार, तो पत्नी पहुंची कोर्ट, इस ‘सबूत’ से रद्द हुई शादी

पुणे के फैमिली कोर्ट (Family Court) ने पति की लिखित कबुली को मुख्य आधार मानते हुए अहम फैसला सुनाया।

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Feb 26, 2026
पति ने शारीरिक संबंधों से किया इनकार, पुणे कोर्ट ने शादी की रद्द (AI Image)

पुणे में एक उच्चशिक्षित दंपती के मामले में फैमिली कोर्ट (Family Court) ने अहम फैसला सुनाते हुए उनका विवाह रद्द कर दिया है। पति द्वारा बार-बार शारीरिक संबंधों से इनकार किए जाने के बाद पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान पति का लिखित कबूलनामा इस मामले में सबसे बड़ा सबूत बना और अदालत ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के प्रावधानों के तहत विवाह को निरस्त कर दिया।

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क्या है पूरा मामला

इस मामले में पति और पत्नी दोनों ही उच्च शिक्षित हैं। दोनों का विवाह रिश्तेदारों की मध्यस्थता से यानी अरेंज मैरिज हुई थी। शादी के बाद पत्नी सुनहरे भविष्य के सपने लेकर ससुराल पहुंची थी, लेकिन कुछ ही दिनों में उसे कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ा।

पत्नी का आरोप था कि पति ने शारीरिक संबंध बनाने में बार-बार टालमटोल की। कई बार बातचीत और समस्या को सुलझाने की कोशिशों के बावजूद पति के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। आखिर इस रिश्ते में कोई भविष्य न देखते हुए पत्नी ने अपने मायके लौटने का फैसला किया और कानूनी रास्ता अपनाया।

अदालत पहुंचा मामला

पत्नी ने पुणे के कुटुंब न्यायालय (Family Court) में विवाह रद्द करने की याचिका दायर की। कानूनी प्रक्रिया के दौरान एक बड़ा मोड़ तब आया जब पति ने खुद लिखित हलफनामा पेश किया। इस लिखित जवाब में पति ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उनके बीच कभी भी शारीरिक संबंध (Consummation of Marriage) स्थापित नहीं हुए।

दोनों पक्षों में तथ्यों को लेकर कोई विवाद नहीं रहा। ऐसे में अदालत ने लंबी सुनवाई या गवाहों की जिरह की जरूरत नहीं समझी। न्यायाधीश बी. डी. कदम ने विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत दोनों के विवाह को रद्द करने का आदेश दिया।

क्या कहता है कानून?

विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अनुसार यदि विवाह का उपभोग नहीं हुआ है या पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हुए हैं, तो संबंधित पक्ष अदालत में विवाह निरस्त करने की मांग कर सकता है। न्यायाधीश बी. डी. कदम ने इसी आधार पर पत्नी को राहत प्रदान की।

इस मामले में महिला के वकील एडवोकेट धनंजय जोशी के मुताबिक, जब प्रतिवादी खुद लिखित रूप में तथ्यों को स्वीकार कर ले और किसी बिंदु पर विवाद न हो, तो अदालत संक्षिप्त प्रक्रिया अपनाकर निर्णय दे सकती है। जब तथ्य स्पष्ट हो तो मामले में लंबी गवाही या क्रॉस-एग्जामिनेशन की आवश्यकता नहीं रह जाती। इससे न केवल सभी पक्षों को मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है, बल्कि अदालत का कीमती समय भी बचता है।

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Published on:
26 Feb 2026 02:58 pm
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