कैराना उपचुनाव से भले ही बसपा सुप्रीमाे मायावती ने खुद को अलग कर रखा हो लेकिन वह चाहकर भी कैराना को भुला नहीं सकती हैं
शरद अस्थाना, नोएडा। अब सभी की नजरें कैराना और नूरपुर उपचुनाव पर लगी हैं। इसके लिए तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। दोनों जगह 28 मई को वोटिंग होनी है जबकि 31 को मतगणना होगी। सपा और रालोद की तरफ से पूर्व सांसद तबस्सुम हसन को प्रत्याशी को बनाया गया है जबकि भाजपा की तरफ से मृगांका सिंह का नाम सबसे आगे चल रहा है। यह तो हुई वर्तमान की बात। अब हम आपको कैराना लोकसभा सीट के बारे में कुछ रोचक जानकारी देते हैं।
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कैराना को नहीं भुला सकती हैं मायावती
भले ही इस उपचुनाव से बसपा सुप्रीमाे मायावती ने खुद को अलग कर रखा हो लेकिन वह चाहकर भी कैराना को भुला नहीं सकती हैं। इसकी एक वजह यह है कि यहां रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ रहीं तबस्सुम हसन कैराना से बसपा के टिकट पर सांसद बनी थीं। इतना ही नहीं बसपा सुप्रीमो खुद यहां से चुनाव लड़ चुकी हैं। हालांकि, उसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें हराने वाले भी कोई नहीं बल्कि तबस्सुम हसन के ससुर और मरहूम मुनव्वर हसन के पिता चौधरी अख्तर हसन थे। 1984 में मायावती ने अपना पहला चुनाव कैराना सीट से ही लड़ा था लेकिन वह उसमें कांग्रेस प्रत्याशी अख्तर हसन से हार गई थीं। उस चुनाव में मायावती तीसरे नंबर पर रही थीं। उन्हें 44,445 वोट मिले थे।
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अख्तर हसन ने रखी थी नींव
वहीं, 1984 के लोकसभा चुनाव में चौधरी अख्तर हसन ने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज कर क्षेत्र में हसन परिवार की राजनीतिक नींव रखी थी। मायावती को हराने के कारण उनका राजनीतिक रुतबा और बढ़ गया था। इसके बाद अख्तर हसन की राजनीतिक विरासत उनके बेटे मुनव्वर हसन ने संभाली थी। मुनव्वर हसन के इंतकाल के बाद उनकी बेगम तबस्सुम हसन और बेटे नाहिद हसन ने इसको आगे बढ़ाया।
ये रहे हैं सांसद
अख्तर हसन के बाद यहां से 1989 और 91 में जनता दल के हरपाल सिंह, 96 में सपा से मुनव्वर हसन, 98 में भाजपा के विरेंद्र वर्मा, 99 में रालोद के आमिर आलम खान और 2004 में रालोद की ही अनुराधा चौधरी संसद पहुंचे थे। अगले लोकसभा चुनाव में कैराना से मरहूम मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन ने बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी लेकिन 2014 के आम चुनाव यह सीट भाजपा के हुकुम सिंह के पास चली गई थी।
किराना घराने की है जन्मस्थली
कैराना हाल ही में पलायन मुद्दे को लेकर काफी चर्चा में रहा था। भाजपा सांसद बाबू हुकुम सिंह ने इए मुद्दे को काफी जाेरशोर से उठाया था। लेकिन आपको बता दें कि कैराना भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा को जानने वालों के लिए तीर्थस्थल की तरह है। किराना घराना कैराना की जमीन से ही पनपा है। इसका डेढ़ सौ साल पुराना इतिहास है। बताया जाता है कि किराना घराना ने एक से एक बढ़कर उस्ताद इस देश को दिए हैं।
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यह है जातीय समीकरण
अगर बात यहां के जातीय समीकरण और विधानसभा क्षेत्रों की करें तो इसके अंतर्गत विधानसभा की पांच सीटें आती हैं। इनमें नकुड़, गंगोह, थाना भवन, शामली और कैराना शामिल हैं। नकुड़ और गंगोह सहारनपुर जिले का हिस्सा हैं। इनमें से चार सीटें भाजपा के पास जबकि एक सपा के पास है। इस लोसकभा सीट पर करीब 5.20 लाख मुस्लिम, 2.80 लाख दलित, 1.30 लाख जाट, 1.24 लाख गुर्जर, 1.22 लाख कश्यप और 1.15 लाख सैनी वोटर हैं। इनके अलावा 60 हजार ठाकुर, 62 हजार ब्राह्मण और 61 हजार वैश्य वोट हैं। आपको बता दें कि ये आंकड़े अनुमानित हैं।