
- कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर सुविधाओं का अभाव
रियांश्यामदास. नवजात शिशु के लिए मां का दूध सबसे सुरक्षित और संपूर्ण आहार माना जाता है, लेकिन आज भी कई कामकाजी महिलाओं को स्तनपान कराने में सामाजिक झिझक और सुविधाओं की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। घर की जिम्मेदारियों और नौकरी के बीच संतुलन बनाते हुए कई माताएं कार्यस्थलों पर एकांत स्थान नहीं मिलने तथा सार्वजनिक जगहों पर असहज माहौल के कारण समय पर शिशु को दूध नहीं पिला पातीं। इसका सीधा असर नवजात के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
हर वर्ष 1 से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाकर मातृ दुग्ध के महत्व के प्रति जागरूक किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता के साथ कार्यस्थलों और समाज में अनुकूल वातावरण तैयार करना भी जरूरी है।
फीडिंग रूम और सहयोग का अभाव बड़ी चुनौती
अधिकांश कार्यालयों में स्तनपान कक्ष (फीडिंग रूम) की व्यवस्था नहीं है। मातृत्व अवकाश के बाद लौटने वाली महिलाओं को पर्याप्त फीडिंग ब्रेक भी नहीं मिल पाते। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भी स्तनपान के लिए सुरक्षित एवं सम्मानजनक स्थानों का अभाव बना हुआ है।
मेड़ता उपजिला चिकित्सालय के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. बलदेव राम चौधरी ने बताया कि मां का पहला गाढ़ा दूध बच्चे के लिए पहले टीके की तरह होता है, जो उसे अनेक गंभीर बीमारियों से बचाने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि स्तनपान केवल मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, कार्यस्थल और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि महिलाओं को सहयोगी माहौल और आवश्यक सुविधाएं मिलेंगी, तभी हर नवजात को उसका पहला और सबसे महत्वपूर्ण अधिकार सहज रूप से मिल सकेगा।