कागजों में हाईटेक, हकीकत में ताले: लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद सरकारी स्कूलों में चालू नहीं हो पाई आईसीटी लैब, जयपुर स्तर से हुए ठेके में ठेकेदार कम्पनी ने किया भ्रष्टाचार, स्कूलों में लगाए निम्न गुणवत्ता के कंप्यूटर व अन्य सामान, जो चालू ही नहीं हो पाए, बड़ा सवाल : ऐसे में स्कूली बच्चों को कैसे मिलेगी डिजिटल शिक्षा और कैसे करेंगे एआई का उपयोग
नागौर. राजस्थान के सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा का सपना आईसीटी लैब घोटाले की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। सरकारी स्कूलों में जनसहभागिता से इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (आईसीटी) 25:75 योजना के तहत भामाशाहों और सरकार के करोड़ों रुपए खर्च कर जिन कंप्यूटर लैबों से विद्यार्थियों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने का दावा किया गया था, वे आज या तो बंद पड़ी है या फिर उनमें कंप्यूटर कबाड़ बने पड़े हैं। नागौर सहित प्रदेश के एक हजार से अधिक स्कूलों में करीब 32 करोड़ रुपए (सरकार के 24 करोड़ और भामाशाहों के 8 करोड़) की लागत से स्थापित लैब में घटिया गुणवत्ता के कंप्यूटर और उपकरण लगाए गए, जो चालू होने से पहले ही जवाब दे गए।
चौंकाने वाली बात यह है कि गड़बडिय़ों की शिकायत, जांच रिपोर्ट और सबूत सामने आने के बावजूद राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद के उच्चाधिकारी मौन साधे हुए हैं। नियमों को ताक पर रखकर ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया गया, जबकि भामाशाहों का भरोसा टूटता जा रहा है। इस लापरवाही और भ्रष्टाचार का सीधा नुकसान छात्रों के भविष्य और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की साख को हो रहा है। पूर्व में हुई धांधली से सबक नहीं लेने के कारण हुए एक बार फिर प्रदेश की स्कूलों में आईसीटी लैब के लिए 350 करोड़ का टेंडर विवादों में है, जिसमें तीन बार टेंडर रद्द होने के बावजूद उन्हीं फर्मों को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है, जो तकनीकी रूप से योग्य नहीं थीं।
जांच में खुली पोल, फिर भी कार्रवाई शून्य
इस पूरे मामले में शिक्षा परिषद के अधिकारियों की कार्यशैली भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि करीब ढाई साल पहले गोगेलाव विद्यालय में घटिया उपकरण लगाने को लेकर भामाशाह रवि बोथरा की शिकायत पर शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने कमेटी बनाकर जांच की, जिसमें गड़बड़ी उजागर भी हो गई। जांच कमेटी की ओर से स्कूल शिक्षा परिषद को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार लैब में न तो कम्प्यूटर उपकरण निर्धारित मापदंड वाले हैं और न ही कम्प्यूटर टेबल व अन्य सामान। इसके बावजूद ठेकेदार कम्पनी के खिलाफ दो साल बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ हो कार्रवाई
सरकार एक तरफ बच्चों डिजिटल शिक्षा व एआई की पढ़ाई कराने की बात करती है और दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में प्रथम व द्वितीय चरण में स्थापित आईसीटी लैब के ठेके पूरे होने के बाद ठेकेदारों ने कंप्यूटर ही हटा लिए। जिला मुख्यालय के रतन बहन बालिका स्कूल में कंप्यूटर प्रयोगशाला में कंप्यूटर ही नहीं हैं। कांकरिया स्कूल में कंप्यूटर हैं, लेकिन आधे से ज्यादा खराब पड़े हैं। जनसहभागिता योजना से जहां आईसीटी लैब स्थापित की गई, वहां ठेकेदार कम्पनी ने निर्धारित मापदंडों को ताक पर रखकर घटिया उपकरण लगा दिए। इस बात को खुद संस्था प्रधान और शिक्षा विभाग अधिकारी स्वीकार कर रहे हैं, जो जांच में साबित भी हो गया, इसके बावजूद ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है।
बच्चों की शिक्षा पर प्रभाव
- शैक्षिक नुकसान: डिजिटल साक्षरता का सपना अधूरा रह गया और छात्रों को कंप्यूटर व इंटरनेट का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
- स्थायी शिक्षकों की कमी: लैब में पढ़ाने के लिए कंप्यूटर शिक्षक या ट्रेनर मौजूद नहीं हैं। इन गड़बडिय़ों के चलते कई जगहों पर कंप्यूटर लैब मात्र शोपीस बनकर रह गई हैं।
पत्रिका व्यू... कब तक थोथे आश्वासन देते रहेंगे शिक्षा मंत्री दिलावर
नागौर जिले सहित प्रदेश के सरकारी स्कूलों में स्थापित की गई आईसीटी लैब में घटिया गुणवत्ता के कंप्यूटर और उपकरण लगाने के बावजूद सरकार केवल कार्रवाई के थोथे आश्वासन दे रही है। गोगेलाव विद्यालय की आईसीटी लैब में स्थापित किए गए निम्न गुणवत्ता के उपकरणों को लेकर डेढ़ साल पहले गोगेलाव आए शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को भामाशाह रवि कुमार बोथरा व ग्रामीणों ने शिकायत दी थी, जिस पर दिलावर ने कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यही हाल पूरे प्रदेश में है। ठेकेदार कम्पनी की ओर से किए गए भ्रष्टाचार व उच्चाधिकारियों की उदासीनता के चलते बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा से वंचित रहना पड़ रहा है। सरकार को चाहिए कि ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ सख्त एक्शन लेते हुए जल्द से जल्द अच्छी गुणवत्ता के कंप्यूटर लगे।
हर माह भेजते हैं रिपोर्ट
ठेकेदार कम्पनी की ओर से आईसीटी लैब में निम्न गुणवत्ता के कम्प्यूटर सेट लगाने से कहीं संस्था प्रधान लैब टेकओवर नहीं कर रहे हैं तो कहीं कम्प्यूटर बंद पड़े हैं। इसको लेकर हर महीने रिपोर्ट मुख्यालय को भेजी जाती है।
- प्रहलादराम तानन, डीईओ, माध्यमिक शिक्षा, नागौर