
नागौर. जिले में पिछले कई दिनों से बारिश नहीं होने और तेज हवा (झोला) चलने से खरीफ की फसलें झुलसने लगी हैं। खेतों में खड़ी ग्वार, मूंग और बाजरा की फसल पर इसका सीधा असर दिखाई दे रहा है। बारिश के अभाव में मिट्टी में नमी खत्म होने से फसलें सूखने लगी हैं। इसके कारण उत्पादन में बड़ी गिरावट आने की आशंका है। ऐसे में किसानों के सामने फसल को बचाने के साथ-साथ समय पर कटाई कराने की चुनौती भी खड़ी हो गई है, जबकि जिला प्रशासन ने अभी तक फसल कटाई प्रयोग (क्रॉप कटिंग एक्सप्रीमेंट - सीसीई) शुरू नहीं किए हैं, जिससे किसानों को बड़ा नुकसान होने की आशंका है।
गौरतलब है कि इस बार जिले में मानसून की स्थिति कमजोर रही है। एक जून से अब तक जिले में मात्र 290 एमएम औसत बारिश दर्ज की गई है। कई क्षेत्रों में औसत से कम बारिश होने के कारण खरीफ फसलों को पर्याप्त नमी नहीं मिल पाई। वहीं दूसरी तरफ जून में पश्चिमी विक्षोभ के कारण हुई बारिश के बाद जिले के अधिकांश हिस्सों में 8 से 12 जून के बीच मूंग और बाजरा की बुआई हो गई थी। बुआई के बाद अब मूंग की फसल को करीब 80 दिन हो चुके हैं। फसल के पकने के लिए यह अवधि पर्याप्त मानी जाती है। बारिश नहीं होने और फसल की अवधि पूरी होने के कारण कई क्षेत्रों में मूंग पककर तैयार हो चुकी है।
बारिश की उम्मीद में कटाई को मजबूर किसान
किसानों का कहना है कि पक चुकी मूंग की फसल को खेत में अधिक समय तक छोडऩा जोखिम भरा है। आगामी दिनों में बारिश होने पर तैयार फसल खराब हो सकती है। वहीं पिछले कुछ दिनों से दिनों से चल रही तेज हवा ने भी किसानों की चिंता बढ़ा दी है। हवा के कारण खेतों में खड़ी फसलें प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में किसान कई जगह फसल को बचाने के लिए समय से पहले कटाई कर रहे हैं। किसानों की सबसे बड़ी चिंता अब फसल कटाई प्रयोग यानी क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट (सीसीई) को लेकर है। उनका कहना है कि यदि सीसीई समय पर नहीं हुआ तो उन्हें फसल खराब होने की स्थिति में बीमा और सरकारी सहायता का लाभ नहीं मिल पाएगा।
गिरदावरी शुरू, लेकिन सीसीई का इंतजार
राजस्व विभाग के अनुसार जिले में इस बार एक अगस्त से गिरदावरी शुरू हो चुकी है। सामान्य तौर पर इसके बाद करीब 15 दिन बाद फसल कटाई प्रयोग के लिए अलॉटमेंट कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन अभी तक जिला प्रशासन की ओर से पटवारियों, कृषि पर्यवेक्षकों और अन्य संबंधित कार्मिकों को फसल कटाई प्रयोग के लक्ष्य आवंटित नहीं किए गए हैं। इसके चलते सीसीई की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। किसानों की चिंता इसलिए भी जायज है कि यदि फसल कटाई प्रयोग में देरी होती है तो उस समय तक कई खेतों में फसल कट चुकी होंगी और खेत खाली हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में मौके पर खड़ी फसल का आकलन कर सीसीई करना मुश्किल होगा।
बीमा और अनुदान पर भी संकट
फसल कटाई प्रयोग का फसल बीमा योजना के साथ सीधा संबंध है। किसानों का कहना है कि यदि सीसीई समय पर नहीं हुआ तो फसल उत्पादन में हुए नुकसान का वास्तविक आकलन प्रभावित हो सकता है। इसका असर फसल बीमा के दावों पर पड़ सकता है। वहीं यदि जिले में अकाल या सूखे जैसी स्थिति बनती है तो राज्य सरकार की ओर से दिए जाने वाले अनुदान और राहत के लिए भी फसल नुकसान का आकलन महत्वपूर्ण होगा।
जल्द शुरू कराए जाएं सीसीई
भाकियू टिकैत के जिलाध्यक्ष अर्जुनराम लोमरोड़ सहित किसानों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए फसल कटाई प्रयोग जल्द शुरू कराए जाएं, ताकि खेत खाली होने से पहले फसल की वास्तविक स्थिति दर्ज हो सके। किसानों का कहना है कि एक तरफ बारिश की कमी से फसलें खेतों में झुलस रही हैं और दूसरी तरफ सीसीई में देरी उनके लिए दोहरी मार साबित हो सकती है।